कभी कभी यह मन यूं चाहे,

कभी कभी यह मन यूं चाहे,
आज तोड़ कर बन्धन सारे  
उड़े कहीं उन्मुक्त गगन में
कटी पतंगों सा आवारा

खोल सोच का अपनी पिंजरा
काटे संस्कृतियों के बन्धन
धरे ताक पर इतिहासों का
जीवन पर जकड़ा गठबन्धन
तथाकथित आदर्शों का भ्रम
जो थोपा सर पर समाज ने
काट गुत्थियां सीधा कर दे
पल भर में सारा अवगुंठन

रोके चलती हुई घड़ी के
दोनों के दोनों ही कांटे
और फिरे हर गैल डगर में
बिन सन्देश बना  हरकारा

दे उतार रिश्तों की ओढ़ी
हुई एक झीनी सी चादर
देखे सब कुछ अजनबियत की
ऐनक अपने नैन चढ़ाकर
इसका उसका मेरा तेरा
रख दे बाँध किसी गठरी में
और  बेतुकी रचना पढ़ ले
अपने पंचम सुर में गाकर

भरी दुपहरी में सूरज को
दीप जला कर पथ दिखलाये
पूनम की कंदील बनाकर
उजियारे आँगन चौबारा  
  
जीवन की आपा धापी को
दे दे जा नदिया में धक्का 
प्रश्न करे जो कोई, देखे
उसको होकर के भौचक्का
जब चाहे तब सुबह उगाये,
जब चाहे तब शाम ढाल दे
रहे देखता मनमौजी मन
हर कोई रह हक्का बक्का 

जब चाहे तब कही ग़ज़ल को 
दे दे नाम गीत का कोई 
और तोड़ कर बन्धन गाये
प्रेम गीत लेकर हुंकारा  

सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन

सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन जीवन एक निमिष रह पाये
हर धड़कन, हर सांस और पल, कहीं किसी से बँधा हुआ है

पहली बार धड़कते दिल ने पह्ली बार आँख जब खोली
बांधे रही उसे उस पल से प्रीत भरी ममता के धागे
पहली बार प्रस्फ़ुटित स्वर ने सम्बोधन के रिश्ते जोड़े
तब ही से बन्धन अनगिनती ले ले कर अंगड़ाई जागे

कैसे भला तोड़ कर बन्धन पथे से कदम अग्रसर हो लें
उठने वाला एक एक पग, पथ पर ही तो सधा हुआ है

यौवन के वयसन्धि मोड़ पर दृष्टि साधना के सँवरे पल
उनकी अंगड़ाई ने जकड़ा तन को मन को सम्मोहित कर
कालचक्र के रुके हुये गतिक्रम में बन्दी हुई ज़िन्दगी
एक बिन्दु के होकर स्तंभित हुये समूचे निशि औ’ वासर

था मुमकिन यह नहीं तोड़ कर बन्धन ऐसे मोह पाश के
विमुख हो चले, क्योकि सृष्टिक्रम इस पर ही तो टिका हुआ है

जीवन की चढ़ती दोपहरी उलझी व्यवसायिक्ताओ में
रहा असंभव दामन कोई उससे दूर कभी रख पाये
एक राग था एक ताल में बंधी हुई थी पूरी सरगम
अवरोहो से पंचम तक सुर चाहे कितने खुल कर गाये

संभव नहीं तोड़ कर बंधन नव चरित्र अभीनीत कर सकें
निर्देशक ने पूर्ण कथानक निर्धारित कर रखा हुआ है
 

मैं कहानी गीतमय करने लगा हूँ

आपका ये तकाजा लिखूँ गीत मैं कुछ नई रीत के कुछ नये ढंग के
ज़िन्दगी की डगर में जो बिखरे पड़े, पर छुये ही नहीं जो गये रंग के
मैने केवल दिये शब्द हैं बस उन्हें सरगमों ने बिखेरा  जिन्हें ला इधर
कामना शारदा बीन को छोड़ कर राग छेड़े नये आज कुछ चंग पे
 
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मैं कहानी गीतमय करने लगा हूँ 
 
था कहा तुमने मुझे यह ज़िन्दगी है इक कहानी
हर कड़ी जिसमें निरन्तर रह रही क्रम से अजानी
एक लेखक की कथानक के बिना चलती कलम सी
चार पल रुक, एक पल बहती नदी की बन रवानी
 
मैं तुम्हारे इस कथन की सत्यता स्वीकार करता
अनगढ़ी अपनी कहानी गीतमय करने लगा हूँ
 
चुन लिया अध्याय वह ही सामने जो आप आया
दे दिया स्वर बस उसी को, जो अधर ने गुनगुनाया
अक्षरों के शिल्प में बोकर समूची अस्मिता को
तुष्टि उसमें ढूँढ़ ली जो शब्द ने आ रूप पाया
 
जो टपकती है दुपहरी में पिघल कर व्योम पर से
या निशा में, मैं उसी से आँजुरी भरने लगा हूँ
 
रात की अंगड़ाईयां पुल बन गईं हैं जिन पलों का
आकलन करती रहीं आगत,विगत वाले कलों का
बुन रहे सपने धराशायी हुई हर कल्पना पर
हैं अपेक्षा जोड़ती ले बिम्ब चंचल बादलों का
 
ज्ञात होना अंकुरित नव पल्लवों का है जरूरी
इसलिये मैं आज पतझर की तरह झरने लगा हूँ
 
चेतना के अर्थ से क्या दूरियाँ अवचेतना की
मुस्कुराहट से रही कब दूरियाँ भी वेदना की
शाश्वतों से भंगुरों के मध्य में है भेद कितना
मौन से कितने परे हैं दूरियां संप्रेषणा की
 
देर तक छाया नहीं मिलती,  हवा की ओढ़नी से
मैं इसे स्वीकार करता धूप में तपने लगा हूँ- 

समा गया तुम में

जो भी पल था मेरा अपना समा गया तुम में
शेष नहीं है पास मेरे कुछ कहने को अपना

समय सिंधु ने सौंपी थी जो लहरों की हलचल
एक आंजुरि में संचित जितना था,  गंगाजल
मुट्ठी भर जो मेह सावनी बदल से माँगा  

और हवा से आवारा सा इक झोंक पागल

पास तुम्हारे आते ही सब समां गया तुम में 
नहीं रह सका पास मेरे आँखों का भी सपना

अर्जित किया उम्र ने जितना संस्कृतियों का ज्ञान
और प्राप्त जो किया सहज नित करते अनुसन्धा
दिवस निशा चेतन अवचेतन  के सारे पल क्षण
विश्वासों का निष्ठा का सब अन्वेषित विज्ञान

पलक झपक में यह सब कुछ ही समा गया तुम में
अकस्मात् ही घटित हो गई लगा कोई घटना


कल्प, युगों मन्वन्तर का जो रचा हुआ इतिहास 
पद्म, नील, शंखों में बिखरी चिति बन कर जो सांस 
लक्ष कोटि नभ गंगाओं के सृजन विलय का गतिक्रम 
सूक्ष्म बिंदु से, परे कल्पना क्षितिजों तक अहसास 

जो कुछ तुमसे शुरू हुआ था  साथ समय के प्रियतम 
समा गया तुम में  अब बाकी कोई नहीं संरचना 

व्रत रक्खे एकादशियों के

एक पुरानी परिपाटी का अन्ध अनुसरण करते करते
कितनी बार पूर्णिमा पूजीं, व्रत रक्खे एकादशियों के

था  यह ज्ञात मान्यताओं को, ये हैं गहरी सघन गुफ़ायें
जहां ज्ञान का और विवेक का कोई दीप नहीं जल पाता 
फ़िसल चुके हैं जो सरगम की अलगनियों पर से टूटे सुर
मन का तानसेन उनको ही चुन, दीपक-मल्हार सुनाता

बरगद के मन्नत  धागों से ले पीपल के स्वस्ति चिह्न तक
दो ही द्वार चुने थे हमने, जीवन की लम्बी गलियों के

पथ की ठोकर समझा समझा, हार गई आखिर बेचारी
काली कमली पर चढ़ पाना रंग दूसरा नामुमकिन था
रही मानसिकता सूदों के चक्रवृद्धि व्यूहों में उलझी
याद रखा ये नहीं सांस को मिला मूल में कितना ऋण था

अंकगणित से बीजगणित तक खिंची हुई उलझी रेखा में
रहे ढूँढ़ते समीकरण हम नक्षत्रों की ज्यामितियों के

था स्वीकारा धुंधली होती हैं दर्पण में हर परछाईं
और असंभव गिरे झील में चंदा को मुट्ठी में बाँधें
फिर भी आस लगाई हमने नदिया से चुन शैलखंड से
किन्ही अदेशी आकृतियों से रखी बाँध अतृप्ता साधें

रहा असंभव सने पंक में पगचिह्नों के दाग छूटना
ज्यों की त्यों कब रख पायेंगे चादर ओढ़ी यह, पटियों पे

इस पनघट पर तो छलकी


इस पनघट पर तो छलकी हैं सुबह शाम रस भरी गगरैया
लेकिन प्राणों के आँगन में तृषा रही बाकी की बाकी

अधरों पर उग रही प्यास ने कितने ही झरने पी डाले
नदिया के तट से भी लौटा मन हर बार अतृप्ता रह कर
उगा अगत्स्यों वाला आतुर एक मरुस्थल तप्त ह्रदय में
कितनी ही सलिलायें आयीं नभ की गंगा से बह बह कर

कितने सागर, कितने मीना गिनती जिनको जोड न पाई
रही ताकती शून्य क्षितिज पर लेकिन यह सुधियों की साकी

कल तक था संतृप्त सभी कुछ तन भी मनभो दिशा दिशा भी 
छलकाती थी मधुरस पल   पल भीने  सबंधों की गागर
तट की सिकता पर रांगोली  खींचा  करता साँझ सवेरे
मुक्ता मणि के अलंकरण से पुलकित हो हो कर  रत्नाकर

इस पनघट पर तो बिखरा था दूध दही कल तक कलशों से
पर उनका अब दूर दूर तक चिहं नहीं  है शेष जरा भी

दोष नही कुछ इस पनघट का, पनिहारिन पनिहारे बदले
सोख लिया सारे स्रोतों को अभिलाषा की विष बेलों ने
संचय की सुरसा मुख जैसी बढ़ती रही निरन्तर स्पर्धा
और निगलते  रहे  पनपने  से  पहले  ही  अपने   छौने

इस पनघट पर तो पुजती थीं नारी, देव नीर भरते थे
कल तक कथा सुनाया करती , दादी नानी मौसी, काकी

एक पृष्ठ कुछ मुड़ा हुआ है

तुम्हें भेंट में दी जो पुस्तक उसे खोल कर जब देखोगे
पाओगे तब कहीं मध्य में एक पृष्ठ कुछ मुड़ा  हुआ है

उस पुस्तक के पन्नों में हैं अंकित युग की प्रेम कथाएं
जगन्नाथ के सAथ लवंगी, बाजीराव और मस्तानी
रांझा हीर कैसे लैला के साथ साथ नल औ दमयंती
और उर्वशी से पुरुरवा के रिश्ते की प्रीति कहानी

शायद तुम लिखना चाहोगे इक परिशिष्ट उसी पुस्तज में
उस रिश्ते का हम दोनों के मध्य कहीं जो जुड़ा हुआ है

मुड़ा हुआ वह एक पृष्ठ है बन कर तीर जहां संधानित
वहां हमारे संबंधो की तकली कात रही है धागे
जन्म जन्म के एक सूत्र की मिल कर जोड़ रहे वो डोरी
अभिमंत्रित हों लेख भाग्य के वही कहीं नींदों सेजागे 

शिलालवख बन जुड़ा  हुआ हर एक कथानक उस पुस्तक में
जो की व्यस्तता के गतिक्रम में सुधियों में गुड़मुड़ा हुआ है 

कोरे पन्नों में उभरेगा कल इतिहास बना सोन हरा
जहाँ आज के पल पर होंगे हस्ताक्षर ओ मीट तुम्हारे
दिशाबोध बन जाएंगे वे आगत में हर असमंजस को
कभी अगर रसमय सुधियों पर घिरे संशयों के अंधियारे

हो लेगा विश्वास प्रीत का एक बार फिर से चट्टानी
कृत्रिमता में उलझ उलझ जो अभ्रक सा भुडभुडा  हुआ है 

कैनवास था टँगा फ़्रेम में

एक किसी रससिक्त छन्द की अनबूझी तलाश में निशिदिन
रहे खोलते द्वार जालघर पर जाकर सँकरी गलियों के

चारों ओर झाड़ झंखाड़ोंसे भरपूर मिले बीहड़ वन
नभ से थल तक बिछी हुई थी  बस विष  की उच्छृंखल बेलें
अन्तहीन आमंत्रण आकर देते थे आवाज़ बिन रुके
उन्हें सराहें और सहेजने को अपनी सुधियों में ले लें

जितनी बार ढूँढने चाहे मार्ग दूर इनके व्यूहों से
उतनी बार बढ़े हैं घेरे कुछ कलुषित सी प्रवृत्तियों के

बढ़ता कोलाहल पी लेता भावुकता के जल तरंग स्वर
मन की रीती गागर रीती, हर पनघट ने लौटा दी है
दूर क्षितिज तक कैनवास तो तना हुआ है टँगा फ़्रेम में
लेकिन प्रिज़्मों ने किरणों की आवेदनता ठुकरा दी है

आड़ी तिरछी रेखाओं को मानचित्र कह कर तलाशते
वे रस्ते जो गुम हो बैठे, साहित्यिक बारादरियों के

होती थीं जब अनायास ही गीतों में निमग्न संध्याएं
पोटोमक के तट पर गाया करती कोई सजल रागिनी
उसकी कोमल छुअन आज भी आ सुधियों को सिहराती हैं
मन होता आतुर है भर ले खुली बांह में झरी चांदनी

पर अब कृत्रिमता में ढूँढ़ें वैरागी आवारा नजरें

कभी फेसबुक पर मिल जाएँ, छंद नई गीतांजलियों के 

किसकी प्यास बुझाए बादल

तुमने मुझे बताया था कल, सारी धरा यहां है प्यासी
फिर दो बूँद नीर की लेकर, किसकी प्यास बुझाए बादल 
 
चारों ओर अबुझ प्यासों के सीमाहीन मरुस्थल फ़ैले
एक नई तृष्णा बोता है उगता हुआ दिवस आ आ कर
उलझे हुये नये व्यूहों में नित नित बढ़ती है अकुलाहट
फ़ैला करते पांव, सिमटती जाती हैं पल पल पर चादर

बढ़ती हुई शुष्कताओं से घिर कर रक्तिम ही रहता है
वो प्राची हो या कि प्रतीची तक फैला नभ का नीलांचल 

उदयाचल के पनघट पर भी उगती रही प्यास निशि वासर
अस्ताचल के सूने तट  पर आस लगाए आतुर नैना 
घाटी की सूनी  पगडण्डी ढूंढे  मरू ओढ़े नदिया को 
सब मरीचिकाओं में उलझे , खोते रहे हृपास का चैना  


तपती हुई जेठ की गर्मी या सावन का श्यामल अम्बर
इस नगरी में हर कोई प्यासा, किसकी प्यास बुझाए बादल 

प्यादे की हर घड़ी प्यास है, वो वज़ीर के पद तक पहुंचे
मंत्रा की है प्यास निरंतर कैसे वह राजा बन जाए
प्यासी बतखें मोती  चुगना चाहें राजहंस के जैसे
कव्वे की तृष्णा है कैसे कोयल का सुर लेकर गाये

है बबूल को प्यास पुज  सके किसी तरह बरगद के जैसा
तालाबों का नीर चाहता, भरे आंजुरी हो गंगाजल
ये नया  वर्ष आकर हमें कह रहा आज हम कुछ नई कामनाएं करें
प्रीत अभिमंत्रिता हम सुधाएं लिए आज हर इक खुली आंजुरि को भरें
हर बरस जो बिखर खंडहर हो गई आस के सारे अवशेष चुनते हुए
अपने संकल्प नूतन सजाते हुए कोई निर्माण नूतन सभी मिल करें

कामना इस वरस धर्म के नाम पर
कोई भी और अब ना नृशंसी बने
सोच संदूकची में सिमट न रहे
हर बशर वासुधैकं कुटुम्बी बने
अपने घर से जड़ों से न उजड़े कोई
हर शर देश हर एक परिवार हो
कोई दीवार खिंच ना सके अब कहीं
हर गली गाँव पूरा खुला द्वार हो

सीरिया में अमन के कबूतर उड़ें
कोई अब और शरणार्थी न बने

हो वो पेरिस या हो सेन बरनारडिनो
या कि माली न दुहराये जायें कभी
एक अम्बर की चादर की छाया तले
एक मंज़िल के पथ पर चलें मिल सभी
गिरजे मंदिर में मस्जिद सिनेगॉग में
लेश भर भी नहीं मन मुटावा बढे
एक ही पाठ हो एक सन्देश हो
चाहे भाषा कोई भी लिखें या पढ़े

धर्म की आड़ ले और खुद्गर्जियां
इस बरस अपने उल्लू न सीधे करें

इस नए वर्ष में कुछ नई सोच हो
कामनाएं मेरी नव हों, हों आप की
पूर्ण जगती में बढ़ जाए सद्भावना
संतुलन में रहे विश्व का ताप भी
हर दिवस ले के आये नई रौशनी
हर घिरी रात नूतन सपन आंज ले
दिन की तख्ती लिखे नित कथानक नए
और होकर मुदित मन उन्हें बांच ले

कामना है यही इस नए वर्ष में
नव सुधा बिंदु ही बादलों से झरें

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...