किसकी प्यास बुझाए बादल

तुमने मुझे बताया था कल, सारी धरा यहां है प्यासी
फिर दो बूँद नीर की लेकर, किसकी प्यास बुझाए बादल 
 
चारों ओर अबुझ प्यासों के सीमाहीन मरुस्थल फ़ैले
एक नई तृष्णा बोता है उगता हुआ दिवस आ आ कर
उलझे हुये नये व्यूहों में नित नित बढ़ती है अकुलाहट
फ़ैला करते पांव, सिमटती जाती हैं पल पल पर चादर

बढ़ती हुई शुष्कताओं से घिर कर रक्तिम ही रहता है
वो प्राची हो या कि प्रतीची तक फैला नभ का नीलांचल 

उदयाचल के पनघट पर भी उगती रही प्यास निशि वासर
अस्ताचल के सूने तट  पर आस लगाए आतुर नैना 
घाटी की सूनी  पगडण्डी ढूंढे  मरू ओढ़े नदिया को 
सब मरीचिकाओं में उलझे , खोते रहे हृपास का चैना  


तपती हुई जेठ की गर्मी या सावन का श्यामल अम्बर
इस नगरी में हर कोई प्यासा, किसकी प्यास बुझाए बादल 

प्यादे की हर घड़ी प्यास है, वो वज़ीर के पद तक पहुंचे
मंत्रा की है प्यास निरंतर कैसे वह राजा बन जाए
प्यासी बतखें मोती  चुगना चाहें राजहंस के जैसे
कव्वे की तृष्णा है कैसे कोयल का सुर लेकर गाये

है बबूल को प्यास पुज  सके किसी तरह बरगद के जैसा
तालाबों का नीर चाहता, भरे आंजुरी हो गंगाजल

4 comments:

Satish Saxena said...

बहुत सुंदर रचना , आभार भाई जी !

जसवंत लोधी said...

सईयॉ मिले एसे हाय 'जैसे बिन बरसे बादल जाए ।
Seetamni. blogspot. in

प्रवीण पाण्डेय said...

सत्य उभारती पंक्तियाँ।

JEEWANTIPS said...

सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार! मकर संक्रान्ति पर्व की शुभकामनाएँ!

मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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