बढ़ रहे हैं हर डगर में आजकल कोहरे घनेरे
और धुंधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे
रह गये हैं आज स्मॄति की पुस्तकों के पॄष्ठ कोरे
खोल कर पट चल दिये हैं शब्द आवारा निगोड़े
अनुक्रमणिका से तुड़ा सम्बन्ध का हर एक धागा
घूमते अध्याय सारे बन हवाओं के झकोरे
ओढ़ संध्या की चदरिया, उग रहे हैं अब सवेरे
और धुंधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे
हैं पुरातत्वी शिलाओं के सरीखे स्वप्न सारे
अस्मिता की खोज में अब ढूँढ़ते रहते सहारे
जुड़ न पाती है नयन से यामिनी की डोर टूटी
छटपटाते झील में पर पा नहीं पाते किनारे
हैं सभी बदरंग जितने रंग उषा ने बिखेरे
और धुंधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे
भित्तिचित्रों में पिरोतीं आस कल जो कल्पनायें
आज आईं सामने लेकर हजारों वर्ज़नायें
व्यक्तता जब प्रश्न करती हाथ में लेकर कटोरा
एक दूजे को निहारें, लक्षणायें व्यंजनायें
शेष केवल मौन है जो दे रहा है द्वार फेरे
और धुँधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे
लेकिन संबोधन पर
सोचा मैने लिखूँ तुम्हें इक पत्र ह्रदय के भावों वाला
लेकिन संबोधन पर आकर अटकी रही कलम बेचारी
चाहा लिखूँ चम्पई फूलों के रंगों के पाटल वाली
चाहा लिखूं अधर पर खिलते कचनारों की लाली वाली
सोचा लिखूं सुधा का झरना देह धरे उतरा है भू पर
केसर में भीगी हो चन्दन की गंधों से महकी डाली
शतरूपे ! पर सिमट न पाता शब्दों में विस्तार रूप का
शब्दकोश ने हार मान कर दिखला दी अपनी लाचारी
सोचा छिटकी हुई ज्योत्सना लिखूँ शरद वाली पूनम की
सोचा लिखूँ प्रथम अँगड़ाई, फ़ागुन के बहके मौसम की
प्राची के मस्तक पर रखती हुई मुकुट इक रश्मि भोर की
याकि प्रेरणा एक सुखद तुम, लिखूं अजन्ता के उद्गम की
कलासाधिके ! कोई तुलना न्याय नहीं तुमसे कर पाती
क्या मैं देकर नाम पुकारूँ, बढ़ती रही मेरी दुश्वारी
सॄष्टा की जो मधुर कल्पना, कैसे उसको कहो पुकारूँ
जो है अतुल उसे मैं केवल शब्दों से किस तरह संवारूँ
चित्रलिखित हैं नयन और वाणी हो जाती है पाषाणी
तब भावों की अभिव्यक्ति को, किस सांचे में कहो उतारूँ
मधुर सरगमे ! एक नाम से सम्बोधित कर सकूँ असंभव
एक फूल में नहीं समाहित होती गंध भरी फुलवारी
इसीलिये संबोधन पर आ अटकी रही कलम बेचारी
लेकिन संबोधन पर आकर अटकी रही कलम बेचारी
चाहा लिखूँ चम्पई फूलों के रंगों के पाटल वाली
चाहा लिखूं अधर पर खिलते कचनारों की लाली वाली
सोचा लिखूं सुधा का झरना देह धरे उतरा है भू पर
केसर में भीगी हो चन्दन की गंधों से महकी डाली
शतरूपे ! पर सिमट न पाता शब्दों में विस्तार रूप का
शब्दकोश ने हार मान कर दिखला दी अपनी लाचारी
सोचा छिटकी हुई ज्योत्सना लिखूँ शरद वाली पूनम की
सोचा लिखूँ प्रथम अँगड़ाई, फ़ागुन के बहके मौसम की
प्राची के मस्तक पर रखती हुई मुकुट इक रश्मि भोर की
याकि प्रेरणा एक सुखद तुम, लिखूं अजन्ता के उद्गम की
कलासाधिके ! कोई तुलना न्याय नहीं तुमसे कर पाती
क्या मैं देकर नाम पुकारूँ, बढ़ती रही मेरी दुश्वारी
सॄष्टा की जो मधुर कल्पना, कैसे उसको कहो पुकारूँ
जो है अतुल उसे मैं केवल शब्दों से किस तरह संवारूँ
चित्रलिखित हैं नयन और वाणी हो जाती है पाषाणी
तब भावों की अभिव्यक्ति को, किस सांचे में कहो उतारूँ
मधुर सरगमे ! एक नाम से सम्बोधित कर सकूँ असंभव
एक फूल में नहीं समाहित होती गंध भरी फुलवारी
इसीलिये संबोधन पर आ अटकी रही कलम बेचारी
यादों का मौसम
यों तो मौसम अनगिन आते रहे और बीते
एक तुम्हारी यादों का केवल दिन रात रहा
जब जब चली भोर संध्या में झोंकों भरी हवा
तब तब आई उमड़ तुम्हारी यादों की बदली
-रहा भेजता आमंत्रण पल पल उसको सावन
लेकिन मेरा द्वार छोड़ कर गई नहीं पगली
बुनती रही तितलियों के पंखों पर स्वप्न नये
मीत तुम्हारे तन की गंधें, रंगों में भर कर
सेमल के उड़ते फ़ाहों पर अंकित नाम किया
एक तुम्हारा, उगी चाँदनी की आभा लेकर
एक निमिष भी उसकी चादर, जरा नहीं सिमटी
सूरज की किरणों ने आकर कितनी बार कहा
करे कार्तिक दीपों की अगवानी की बातें
या फ़ागुन खेतों को भेजे सोने के गहने
हरे गलीचे करें तीज का स्वागत पथ बिछकर
आँगन देहरी, रंगबिरंगी राँगोली पहनें
चित्र तुम्हारे ही ओढ़ा करती हैं दीवारें
और अजन्ता एलोरा की गलियाँ बन जातीं
खिड़की की सिल पर आ बैठी एक कोई कोयल
एक तुम्हारे स्वर से उपजा हुआ राग गाती
दिन-दोपहरी, माघ-फूस, जेठों-बैसाखों में
एक यही गतिक्रम है जो सांसों के साथ रहा
घिरे गगन-गंगा के तट पर तारों की छाया
करे चाँदनी चन्दा से या प्यार भरी बातें
बेला फूले, महक लुटाये गमक रातरानी
धुली रोशनी से चमकी हों उजियारी रातें
पल की धड़कन दोहराते बस एक नाम केवल
जिसका है प्रारंभ तुम्ही से, और अंत तुम पर
लहरें, भंवरे, बुलबुल, मैना तारों की सरगम
सब दुहराते, और पपीहा गाता है वह स्वर
मौसम कभी बदल पायेगा जब जब यह सोचा
रेतीले टीलों सा वह भ्रम था, हर बार ढहा
एक तुम्हारी यादों का केवल दिन रात रहा
जब जब चली भोर संध्या में झोंकों भरी हवा
तब तब आई उमड़ तुम्हारी यादों की बदली
-रहा भेजता आमंत्रण पल पल उसको सावन
लेकिन मेरा द्वार छोड़ कर गई नहीं पगली
बुनती रही तितलियों के पंखों पर स्वप्न नये
मीत तुम्हारे तन की गंधें, रंगों में भर कर
सेमल के उड़ते फ़ाहों पर अंकित नाम किया
एक तुम्हारा, उगी चाँदनी की आभा लेकर
एक निमिष भी उसकी चादर, जरा नहीं सिमटी
सूरज की किरणों ने आकर कितनी बार कहा
करे कार्तिक दीपों की अगवानी की बातें
या फ़ागुन खेतों को भेजे सोने के गहने
हरे गलीचे करें तीज का स्वागत पथ बिछकर
आँगन देहरी, रंगबिरंगी राँगोली पहनें
चित्र तुम्हारे ही ओढ़ा करती हैं दीवारें
और अजन्ता एलोरा की गलियाँ बन जातीं
खिड़की की सिल पर आ बैठी एक कोई कोयल
एक तुम्हारे स्वर से उपजा हुआ राग गाती
दिन-दोपहरी, माघ-फूस, जेठों-बैसाखों में
एक यही गतिक्रम है जो सांसों के साथ रहा
घिरे गगन-गंगा के तट पर तारों की छाया
करे चाँदनी चन्दा से या प्यार भरी बातें
बेला फूले, महक लुटाये गमक रातरानी
धुली रोशनी से चमकी हों उजियारी रातें
पल की धड़कन दोहराते बस एक नाम केवल
जिसका है प्रारंभ तुम्ही से, और अंत तुम पर
लहरें, भंवरे, बुलबुल, मैना तारों की सरगम
सब दुहराते, और पपीहा गाता है वह स्वर
मौसम कभी बदल पायेगा जब जब यह सोचा
रेतीले टीलों सा वह भ्रम था, हर बार ढहा
कितनी और उम्र बाकी है
हर मौसम फ़ागुन के रंगों में रंग लिया भावनाऒ ने
एक तुम्हारी छवि नयनों ने भित्तिचित्र कर कर टांकी है
अगवानी को आज पंथ पर पांखुर बन कर बिछीं निगाहें
पगरज को सिन्दूर बना लेने को आतुर हैं सब राहें
कौआ चांदी नित्य भोर से छतें लगीं हैं आज सजाने
रुकी हुइ पुरबाई पथ में, स्वागत करने फ़ैला बाहें
रजनी जाना नहीं चाहती, थकी प्रतीची उसे बुलाते
हो अधीर मुड़ मुड़ देखा है, राह तुम्हारी ही ताकी है
सुरभित आशायें प्राची को लगीं और लज्जानत करने
रंग अलक्तक के पांवों पर, लगे और कुछ अधिक उभरने
करने लगा बात बुन्दों से झूम झूम माथे का टीका
चन्द्रहार के माणिक मन की हर धड़कन को आये सुनने
सजने लगे अचानक सारे क्षण अनजाने ही कुछ ऐसे
स्वयं पी रही प्याले भर भर, सुधियों की पागल साकी है
मिलते स्पर्श तुम्हारा होगी मेंहदी से रंगीन हथेली
अँगनाई में अँगड़ाई लेगी आ आ कर भोर नवेली
कंगन के साजों पर चूड़ी छेड़ेगी नव मेघ मल्हारें
पुरबाई बाँहों में भर कर मुझे बनेगी नई सहेली
जागी हुई कल्पना आकर भरती मुझको मधुपाशों में
उम्र प्रतीक्षा वाली निशि की और नहीं ज्यादा बाकी है
एक तुम्हारी छवि नयनों ने भित्तिचित्र कर कर टांकी है
अगवानी को आज पंथ पर पांखुर बन कर बिछीं निगाहें
पगरज को सिन्दूर बना लेने को आतुर हैं सब राहें
कौआ चांदी नित्य भोर से छतें लगीं हैं आज सजाने
रुकी हुइ पुरबाई पथ में, स्वागत करने फ़ैला बाहें
रजनी जाना नहीं चाहती, थकी प्रतीची उसे बुलाते
हो अधीर मुड़ मुड़ देखा है, राह तुम्हारी ही ताकी है
सुरभित आशायें प्राची को लगीं और लज्जानत करने
रंग अलक्तक के पांवों पर, लगे और कुछ अधिक उभरने
करने लगा बात बुन्दों से झूम झूम माथे का टीका
चन्द्रहार के माणिक मन की हर धड़कन को आये सुनने
सजने लगे अचानक सारे क्षण अनजाने ही कुछ ऐसे
स्वयं पी रही प्याले भर भर, सुधियों की पागल साकी है
मिलते स्पर्श तुम्हारा होगी मेंहदी से रंगीन हथेली
अँगनाई में अँगड़ाई लेगी आ आ कर भोर नवेली
कंगन के साजों पर चूड़ी छेड़ेगी नव मेघ मल्हारें
पुरबाई बाँहों में भर कर मुझे बनेगी नई सहेली
जागी हुई कल्पना आकर भरती मुझको मधुपाशों में
उम्र प्रतीक्षा वाली निशि की और नहीं ज्यादा बाकी है
आप- दो पहलू
रात ने अपना घूँघट हटाया नहीं, बाँग इक छटपटाती हुई रह गई
आँख कलियों ने खोली नहीं जाग कर, गूँज भंवरों की गाती हुई रह गई
आप मुझसे विमुख एक पल को हुए,यों लगा थम गई सॄष्टि की हर गति
पैंजनी तीर यमुना के खनकी नहीं, बाँसुरी सुर बजाती हुई रह गई
-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-
सांस के पॄष्ठ पर धड़कनों ने लिखी , आप ही से जुड़ी वो कहानी हुई
आप की चूनरी के सिरे से बँधी, रात की चूनरी और धानी हुई
आप पारस हैं ये तो विदित था मुझे, आज विश्वास मेरा हुआ और दॄढ़
आपकी देह की गंध को चूम कर, नीम की पत्तियाँ रातरानी हुई
आँख कलियों ने खोली नहीं जाग कर, गूँज भंवरों की गाती हुई रह गई
आप मुझसे विमुख एक पल को हुए,यों लगा थम गई सॄष्टि की हर गति
पैंजनी तीर यमुना के खनकी नहीं, बाँसुरी सुर बजाती हुई रह गई
-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-
सांस के पॄष्ठ पर धड़कनों ने लिखी , आप ही से जुड़ी वो कहानी हुई
आप की चूनरी के सिरे से बँधी, रात की चूनरी और धानी हुई
आप पारस हैं ये तो विदित था मुझे, आज विश्वास मेरा हुआ और दॄढ़
आपकी देह की गंध को चूम कर, नीम की पत्तियाँ रातरानी हुई
आपके लिये नव वर्ष
हर दिवस हो नये गीत सा छंदमय, सांझ बन कर गज़ल की रवानी रहे
रात डूबी हुई प्रीत की गंध में चांदनी की नई इक कहानी कहे
बात निशिगंध से मिल चमेली करे, औ’ भरे मोगरा बाँह कचनार को
ऐसी छवियों से सज कर उमगती हुई, इस नये वर्ष की ॠतु सुहानी रहे
मुट्ठियों में संवरने लगे आपकी, आपकी कल्पनाओं का विस्तार सब
स्वप्न हर, भोर में प्रश्न करने लगे, नैन में से निकल शिल्प होना है कब ?
इस नये वर्ष में जितने आयाम हैं सब सिमटते रहें आपके द्वार पर
कामना के सुमन की भरी आंजुरि, आपके पगकमल पे चढ़ाता हूँ अब
रात डूबी हुई प्रीत की गंध में चांदनी की नई इक कहानी कहे
बात निशिगंध से मिल चमेली करे, औ’ भरे मोगरा बाँह कचनार को
ऐसी छवियों से सज कर उमगती हुई, इस नये वर्ष की ॠतु सुहानी रहे
मुट्ठियों में संवरने लगे आपकी, आपकी कल्पनाओं का विस्तार सब
स्वप्न हर, भोर में प्रश्न करने लगे, नैन में से निकल शिल्प होना है कब ?
इस नये वर्ष में जितने आयाम हैं सब सिमटते रहें आपके द्वार पर
कामना के सुमन की भरी आंजुरि, आपके पगकमल पे चढ़ाता हूँ अब
अंतिम गीत
विदित नहीं लेखनी उंगलियों का कल साथ निभाये कितना
इसीलिये मैं आज बरस का अंतिम गीत लिखे जाता हूँ
चुकते हुए दिनों के संग संग
आज भावनायें भी चुक लीं
ढलते हुए दिवस की हर इक
रश्मि, चिरागों जैसे बुझ ली
लगी टिमटिमाने दीपक की
लौ रह रह कर उठते गिरते
और भाव की जो अँगड़ाई थी,
उठने से पहले रुक ली
पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ
लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में न सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में
पता नहीं कल नीड़ पंथ को दे पाथेय नहीं अथवा दे
इसीलिये मैं आज राह का अंतिम मील चले जाता हूँ
गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में न दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,
भला उतना कल भी हो ?
पता नहीं कल धूप, गगन की चादर को कितना उजियारे
इसीलिये मैं आज चाँद को करके दीप धरे जाता हूँ
इसीलिये मैं आज बरस का अंतिम गीत लिखे जाता हूँ
चुकते हुए दिनों के संग संग
आज भावनायें भी चुक लीं
ढलते हुए दिवस की हर इक
रश्मि, चिरागों जैसे बुझ ली
लगी टिमटिमाने दीपक की
लौ रह रह कर उठते गिरते
और भाव की जो अँगड़ाई थी,
उठने से पहले रुक ली
पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ
लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में न सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में
पता नहीं कल नीड़ पंथ को दे पाथेय नहीं अथवा दे
इसीलिये मैं आज राह का अंतिम मील चले जाता हूँ
गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में न दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,
भला उतना कल भी हो ?
पता नहीं कल धूप, गगन की चादर को कितना उजियारे
इसीलिये मैं आज चाँद को करके दीप धरे जाता हूँ
कैसे गीत प्रणय के गाये
ये अम्बर पर घिरी घटाओं में घुलते यादों के साये
ऐसे में अब गीत प्रणय के कोई गाये तो क्या गाये
टूटी हुई शपथ रह रह कर कड़क रही बिजली सी तड़पे
मन के श्याम क्षितिज पर खींचे सुलग रही गहरी रेखायें
भीगी हुई हवा के तीखे तीर चुभें आ कर सीने पर
आलिंगन के घावों की फिर से रह रह कर याद दिलायें
और अकेलापन ऐसे में बार बार मन को हुलसाये
ऐसे में अब गीत प्रणय के गाये भी तो कैसे गाये
बारिश की बून्दों में घुल कर टपक रहे आंखों के सपने
खिड़की की सिल पर बैठे हैं सुधि के भीगे हुए कबूतर
परदों की सिलवट मेम उलझी हुईं इलन की अभिलाषायें
और आस बुलबुलों सरीखी, बनते मिटते रह रह भू पर
उनका फ़ीकापन दिखता है छाये हुए अंधेरे में भी
डूब तूलिका ने आंसू में अब तक जितने चित्र बनाये
झड़ी बने दस्तक देते हैं द्वारे पर आकर ज़िद्दी पल
छँटती नहीं उदासी को ओढ़े जो बैठी है खामोशी
दीवारों पर चलचित्रों सी नर्तित हैं परछाईं धुंधली
और हवायें लगता खुद से ही करती रहतीं सरगोशी
कोरा कागज़ पड़ा मेज पर बिन बोले मुंह को बिचकाये
ऐसे में अब गीत प्रणय को कैसे तुम बतलाओ गाये
ऐसे में अब गीत प्रणय के कोई गाये तो क्या गाये
टूटी हुई शपथ रह रह कर कड़क रही बिजली सी तड़पे
मन के श्याम क्षितिज पर खींचे सुलग रही गहरी रेखायें
भीगी हुई हवा के तीखे तीर चुभें आ कर सीने पर
आलिंगन के घावों की फिर से रह रह कर याद दिलायें
और अकेलापन ऐसे में बार बार मन को हुलसाये
ऐसे में अब गीत प्रणय के गाये भी तो कैसे गाये
बारिश की बून्दों में घुल कर टपक रहे आंखों के सपने
खिड़की की सिल पर बैठे हैं सुधि के भीगे हुए कबूतर
परदों की सिलवट मेम उलझी हुईं इलन की अभिलाषायें
और आस बुलबुलों सरीखी, बनते मिटते रह रह भू पर
उनका फ़ीकापन दिखता है छाये हुए अंधेरे में भी
डूब तूलिका ने आंसू में अब तक जितने चित्र बनाये
झड़ी बने दस्तक देते हैं द्वारे पर आकर ज़िद्दी पल
छँटती नहीं उदासी को ओढ़े जो बैठी है खामोशी
दीवारों पर चलचित्रों सी नर्तित हैं परछाईं धुंधली
और हवायें लगता खुद से ही करती रहतीं सरगोशी
कोरा कागज़ पड़ा मेज पर बिन बोले मुंह को बिचकाये
ऐसे में अब गीत प्रणय को कैसे तुम बतलाओ गाये
बस पंथ थम गया
पांव हमारे ही अक्षम थे
उठे न पथ में एक कदम भी
और लगाते दोष रहे यह
मंज़िल का पथ स्वयं थम गया
किरण ज्योति की बो न सके हम
सूनी रही ह्रदय की क्यारी
यही एक कारण , आंगन में
सिर्फ़ बिखरता हुआ तम गया
असमंजस के श्यामपट्ट पर
बने न निर्णय के श्वेताक्षर
शंकायें जो कल घिर आईं
आईं फिर से आज उमड़ कर
जुड़ीं अनिश्चय के चौराहे
पर न कभी निश्चय की गलियां
ऊहापोहों के गमले में
उगी न संकल्पों की कलियां
और संजोई पूंजी में से
एक दिवस हो और कम गया
खड़े रहे हम ही राहों में
कहते हैं, बस पंथ थम गया
रहे बिखेरे अंगनाई में
संशय के बदरंग कुहासे
खड़े रहे देहरी को थामे
किसी प्रतीक्षा को दुलराते
इन्द्रधनुष चाहत के हमने
प्रश्न चिन्ह से रखे टांग कर
रहे ढूँढ़ते रेखाओं को
आईने से साफ़ हाथ पर
और संजोते रहे पोटली में
जो बिखरा हुआ भ्रम गया
पांव हमारे उठे नहीं, हम कहते
हैं बस पंथ थम गया
फूलों की हर गंध, नाम के
बिना द्वार से लौटा दी है
द्वार चांदनी आई तो बस
यही शिकायत की आधी है
बिकीं रश्मि जब बाज़ारों में
हम तटस्थ ही खड़े रह गये
मधुमासों को नीरस कहते
अपनी ज़िद पर अड़े रह गये
अस्त-व्यस्त यूँ हुई ज़िन्दगी
टूट बिखर कर सभी क्रम गया
पांव हमारे उठे नहीं, हम कहते
हैं बस पंथ थम गया
उठे न पथ में एक कदम भी
और लगाते दोष रहे यह
मंज़िल का पथ स्वयं थम गया
किरण ज्योति की बो न सके हम
सूनी रही ह्रदय की क्यारी
यही एक कारण , आंगन में
सिर्फ़ बिखरता हुआ तम गया
असमंजस के श्यामपट्ट पर
बने न निर्णय के श्वेताक्षर
शंकायें जो कल घिर आईं
आईं फिर से आज उमड़ कर
जुड़ीं अनिश्चय के चौराहे
पर न कभी निश्चय की गलियां
ऊहापोहों के गमले में
उगी न संकल्पों की कलियां
और संजोई पूंजी में से
एक दिवस हो और कम गया
खड़े रहे हम ही राहों में
कहते हैं, बस पंथ थम गया
रहे बिखेरे अंगनाई में
संशय के बदरंग कुहासे
खड़े रहे देहरी को थामे
किसी प्रतीक्षा को दुलराते
इन्द्रधनुष चाहत के हमने
प्रश्न चिन्ह से रखे टांग कर
रहे ढूँढ़ते रेखाओं को
आईने से साफ़ हाथ पर
और संजोते रहे पोटली में
जो बिखरा हुआ भ्रम गया
पांव हमारे उठे नहीं, हम कहते
हैं बस पंथ थम गया
फूलों की हर गंध, नाम के
बिना द्वार से लौटा दी है
द्वार चांदनी आई तो बस
यही शिकायत की आधी है
बिकीं रश्मि जब बाज़ारों में
हम तटस्थ ही खड़े रह गये
मधुमासों को नीरस कहते
अपनी ज़िद पर अड़े रह गये
अस्त-व्यस्त यूँ हुई ज़िन्दगी
टूट बिखर कर सभी क्रम गया
पांव हमारे उठे नहीं, हम कहते
हैं बस पंथ थम गया
पल ने जो उपहार दिया था
मंजूषा में से यादों की पुन: उभर कर आया वह पल
साथ तुम्हारा जिसने मुझको एक दिवस उपहार दिया था
नभ के गलियारे में जब था हुआ
सितारों का सम्मेलन
भाग्य लेख के किसी शब्द ने
किया बाँध कर हाथ निवेदन
तो हो द्रवित सभा ने उस पल
नक्षतों को किया नियंत्रित
और एक वह स्वर्णजड़ित पल
सहसा हुआ वहीं पर शिल्पित
जिसके अन्तर्मन से उपजी हुई एक अनुभूति देख कर
आवेदन, विधि ने सहसा ही बिना शर्त स्वीकार किया था
भू पर आकर उतरे थे तब
नभ की गंगाओं के धारे
कलियों ने अपने सब घूँघट
अगवानी में स्वयं उघारे
चन्दन की गंधों में डूबे
झोंके सारे चली हवा के
कमल. ताल की लहरों पर से
उचक उचक तुमको थे ताके
इन्द्रधनुष पर स्वर्ण किरण के तार बाँध कर मौसम ने भी
साज बना कर नया, तुम्हारी सरगम को झंकार दिया था
वह इक पल जिसमें सहसा ही
हुई सॄष्टि सम्पूर्ण समाहित
सुधियों का संचय पा जिसको
अपने साथ, हुआ आनंदित
जो धड़कन के नव गतिक्रम का
फिर से इक आधार बना है
वही एक पल आकर मेरी
सुधियों का संसार बना है
होकर अब जीवंत खड़ा है मेरी थामे उंगली वह पल
जिसने जाने या अनजाने जीवन पर उपकार किया था
साथ तुम्हारा जिसने मुझको एक दिवस उपहार दिया था
नभ के गलियारे में जब था हुआ
सितारों का सम्मेलन
भाग्य लेख के किसी शब्द ने
किया बाँध कर हाथ निवेदन
तो हो द्रवित सभा ने उस पल
नक्षतों को किया नियंत्रित
और एक वह स्वर्णजड़ित पल
सहसा हुआ वहीं पर शिल्पित
जिसके अन्तर्मन से उपजी हुई एक अनुभूति देख कर
आवेदन, विधि ने सहसा ही बिना शर्त स्वीकार किया था
भू पर आकर उतरे थे तब
नभ की गंगाओं के धारे
कलियों ने अपने सब घूँघट
अगवानी में स्वयं उघारे
चन्दन की गंधों में डूबे
झोंके सारे चली हवा के
कमल. ताल की लहरों पर से
उचक उचक तुमको थे ताके
इन्द्रधनुष पर स्वर्ण किरण के तार बाँध कर मौसम ने भी
साज बना कर नया, तुम्हारी सरगम को झंकार दिया था
वह इक पल जिसमें सहसा ही
हुई सॄष्टि सम्पूर्ण समाहित
सुधियों का संचय पा जिसको
अपने साथ, हुआ आनंदित
जो धड़कन के नव गतिक्रम का
फिर से इक आधार बना है
वही एक पल आकर मेरी
सुधियों का संसार बना है
होकर अब जीवंत खड़ा है मेरी थामे उंगली वह पल
जिसने जाने या अनजाने जीवन पर उपकार किया था
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नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
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प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
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मूर्च्छित है भावना, बिंध वक्त के पैने शरों से लेखनी हतप्रभ शिथिल है, मौन लेखन ओढ़ता है काल के तो चक्र चलते हैं सदा होकर दुधारे युद्ध तो थमता ...
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इस पनघट पर तो छलकी हैं सुबह शाम रस भरी गगरैया लेकिन प्राणों के आँगन में तृषा रही बाकी की बाकी अधरों पर उग रही प्यास ने कितने ही झरने प...