हम करते संवाद रह गए

पल तो रहे सफलताओ  ​के​दूर सदा ही इन राहो से
खड़े मोड़ पर आभासों से हम करते संवाद रह गए

झड़े उम्र की शाखाओं से एक एक कर सारे पत्ते
तय करते पाथेय सजे से नीड सांझ तक के, की दूरी
औ तलाशते हुए आस के पंछी इक सूने अम्बर में
रही रोकती परवाज़ो को जिनकी घिर कोई मज़बूरी

उभरा नहीं नजर के आगे आ कोईआकार  समूचा
परछाई की परछाई से करते वाद- विवाद रह गए

मिला नहीं विश्रांति मोड़ पर बादल का टूटा टुकड़ा भी
बहा ले गए साथ चले विपरीत दिशा में चंचल झोंके
बही चिलचिलाती किरणों के शर से सज्जित हो झंझाये
शस्त्र नहीं था कर में संभव हो न सका पल भर भी रोके

एक बार तो आकर रथ की वलगाये ले ले हाथो में
पार्थसारथी के द्वारे पर नित करते फ़रियाद रह गये

देते रहे निमंत्रण हमको मंज़िल के ऊंचे कंगूरे
हाथो में भी थमी हुई थी लंबी इक कमंद की डोरी
पर अशक्त कांधों की क्षमता आड़े आती रही हर घड़ी
रही ताकती नभ का चन्दा सूनी नजरे आस चकोरी

साँसों की सरगम तो आतुर रही सजाये गीत मधुर इक
आर्त स्वरों में राग रागिनी लेकिन करते नाद रह गए

1 comment:

Udan Tashtari said...

वाह भाई जी

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...