याद तुम्हारी ले आये जब संध्या के बादल
और अधिक गहराया तब तब रजनी का आंचल
बिखरा हुआ हवा का झोंका सन्नाटा पीता
मरुथल के पनघट सा लेकिन रह जाता रीता
फिर अपनी पहचान तलाशे पगडंडी पागल
और अधिक गहरा जाता है रजनी का आंचल
सहमा सहमा सा बादल अम्बर की राहों में
सपना कोई आकर रुक न पाता बाहों में
चन्दनबदनी आस लगाये मावस का काजल
यादों के घट भर भर लाते संध्या के बादल
वादी कोई अपनी परछाईं से भी डरती
प्यासी आशा की रीती आंजुर भी न भरती
बून्द नहीं देती कोई भी उलट गई छागल
और याद फिर आ खड़काती है मन की साँकल
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3 comments:
याद तुम्हारी ले आये जब संध्या के बादल
और अधिक गहराया तब तब रजनी का आंचल
BAHUT SUNDAR
संध्या के बादल कितना कुछ लाने का संकेत देते हुये।
बिखरा हुआ हवा का झोंका सन्नाटा पीता
मरुथल के पनघट सा लेकिन रह जाता रीता
फिर अपनी पहचान तलाशे पगडंडी पागल
और अधिक गहरा जाता है रजनी का आंचल
इन पंक्तियों का कोई जोड़ नही..बेजोड़ होती है आपकी रचनाएँ...प्रणाम
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