कहो तो कौन हो तुम

जो जलधि ने देव को सौंपा, वही उपहार हो तुम ?
जो मणी बन ईश के सीने लगा गलहार हो तुम ?
क्या लहर हो तुम उठी नभ की किसी मंदाकिनी की
प्रीत का बन स्वप्न आँखों में बसा संसार हो तुम ?

बन्द हौं आँखें खुली हों चित्र बनते हैं तुम्हारे
किन्तु अब तक जान मैं पाया नहीं हूँ कौन हो तुम

मात्रा हो अक्षरों को जोड़ कर जो शब्द करती ?
तॄप्ति हो जो प्यास के सूखे अधर पर है बरसती ?
हो सुरभि क्या?पुष्प की पहचान का कारण बनी जो
या सुधा हो जो तुहिन कण सी निशा से प्रात झरती

हो असर डाले हुए अनुभूतियों पर इक अनूठा
धूप की परछाईं बन कर चल रही हो कौन हो तुम

क्या वही तुम जो निरन्तर है मधुप से बात करती ?
क्या वही तुम भोर जिसके साथ प्राची में सँवरती ?
क्या तुम्ही को केश पर शिव ने सजाया धार कर के
या कि जो अलकापुरी का है सहज श्रॄंगार करती ?

बन रहे हैं मिट रहे हैं सैंकड़ों आकार प्रतिपल
ओढ़ न पाता तुम्हारा नाम कोई, कौन हो तुम ?

ज्योत्स्ना हो तुम चली नीहारिकाओं की गली से
गंध हो उमड़ी हुई अँगड़ाईयां लेकर कली से
तार पर वीणाओं के झंकॄत हुई झंकार हो तुम
नीर की हो बूँद छिटकी अर्चना की अंजली से

झिलमिलाते रंग अनगिन रश्मियों की उंगलियों से
पर न कोई रंग तुमसा है, कहो तो कौन हो तुम

16 comments:

Shar said...

:)

मीत said...

बन्द हौं आँखें खुली हों चित्र बनते हैं तुम्हारे
किन्तु अब तक जान मैं पाया नहीं हूँ कौन हो तुम .....

Dr. Amar Jyoti said...

सुकुमार भावों की उतनी ही सुकुमार अभिव्यक्ति।

रचना said...

बन्द हौं आँखें खुली हों चित्र बनते हैं तुम्हारे
किन्तु अब तक जान मैं पाया नहीं हूँ कौन हो तुम

yae to na insafii hui
jaan to gayae
par pehchaan naa hui

पुनीत ओमर said...

मन के भावों की सुंदर अभिव्यक्ति

मोहिन्दर कुमार said...

अनुठे बिम्बों से सजी रचना

बन रहे हैं मिट रहे हैं सैंकड़ों आकार प्रतिपल
ओढ़ न पाता तुम्हारा नाम कोई, कौन हो तुम ?

प्रेम की भावना को नाम और आकार देना सहल कहां है.

Parul said...

हो असर डाले हुए अनुभूतियों पर इक अनूठा
धूप की परछाईं बन कर चल रही हो कौन हो तुम....aabhaar

seema gupta said...

बन रहे हैं मिट रहे हैं सैंकड़ों आकार प्रतिपल
ओढ़ न पाता तुम्हारा नाम कोई, कौन हो तुम ?
" its beautifulllllllllll creation"

Regards

कंचन सिंह चौहान said...

kitani pavitra si kavita hai...har chhanda har shabda...! man me satvikta bhar de.n aisi

सुनीता शानू said...

ज्योत्स्ना हो तुम चली नीहारिकाओं की गली से
गंध हो उमड़ी हुई अँगड़ाईयां लेकर कली से
तार पर वीणाओं के झंकॄत हुई झंकार हो तुम
नीर की हो बूँद छिटकी अर्चना की अंजली से
कितना खूबसूरत वर्णन किया है आपने। कोटिश बधाई...

Udan Tashtari said...

झिलमिलाते रंग अनगिन रश्मियों की उंगलियों से
पर न कोई रंग तुमसा है, कहो तो कौन हो तुम


--क्या बात है भाई जी???? :)

अनुपम अग्रवाल said...

बहुत ही अच्छा शब्द संयोजन और भावों की अद्भुत अभिव्यक्ति.
किस किस लाइन की तारीफ़ की जाए .
अति सुंदर

Shar said...

क्यों तेरे ही द्वार की चौखट पे डाली भोर ने ये
अल्पना जो पावनी रंगों से अरुणिम हो गयी है,
क्या उसे आषीश दें या दें उसे धूलि चरण की
सभ्यता अंकुर सुकोमल,लोरी सुन वहीं सो गई है ।

रंजना said...

क्या वही तुम जो निरन्तर है मधुप से बात करती ?
क्या वही तुम भोर जिसके साथ प्राची में सँवरती ?
क्या तुम्ही को केश पर शिव ने सजाया धार कर के
या कि जो अलकापुरी का है सहज श्रॄंगार करती ?


अद्भुत ! अद्वितीय !
भाव, शब्द नियोजन,बिम्ब विधान ....सब मनोरम.........

Anonymous said...

ui baba, 'kaun ho tum?' kyon batayein?? anonymous hain hum. anamika hai hamara naam. hum akinchan hain, achanak aa jaate hain, adrishya hain, ati sunder bhi hein:)

शारदा अरोरा said...

आपकी सारी कवितायें शब्दों और भावों का अद्भभुत समायोजन लिए हुए हैं | इस कविता को पढ़ कर जो समझ आया वो ये की आपकी प्रेयसी लेखनी और उसकी ही खुशबू है | अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो |

साभार

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