कर्मण्यवाधिकारस्ते

शब्दों में जब सिमट न पाईं अन्तर्मन में उगी व्यथायें
तब हमने उल्लास बिखेरा है राहों में गाते हँसते

सुना, कमन्दें टूटा करतीं हैं छत की सीमा से पहले
और ठोकरें दुलरातीं पग आँगन की देहरी पर आकर
बिखरा जाती पांखुर पांखुर कलिकाओं की खिलते खिलते
और भोर में ही भटकाया करता राहें निकल दिवाकर

रहा सूत भर दूर सदा ही, अथक प्रयासों का हर प्रतिफ़ल
निष्ठा देती किन्तु दिलासा, है कर्मण्यवाधिकारस्ते

स्वप्न स्वप्न ही तो होते हैं, उम्र उषा के मुस्काने तक
चाहे कितने फ़ुंदने बाँधें आशाओं के चूनरिया में
खुले हाथ को मुट्ठी कहकर, भ्रम में रँगकर चेहरा जीते
संचय कहाँ शिवाले वाली हो पाता है गागरिया में

लेकिन आदत की लाचारी ले जाती पग उन राहों पर
जो जाती हैं कभी सुना था, जहां आस के नूपुर बजते

जीवन भरा विसंगतियों से ज्ञात मुझे है तुम भी जानो
पंथ समन्वय के पर चलते रहना होता आवश्यक है
समतल राहों पर बोयी जाती हैं जब फ़सलें मनमानी
गंतव्यों के पथ का कण कण होने लगता तब बाधक है

उस नगरी के गलियारों में सम्बन्धों की लुटती पूँजी
जहाँ स्वार्थ की दूकानों पर भाव बिका करते हैं सस्ते.

9 comments:

Parul said...

समतल राहों पर बोयी जाती हैं जब फ़सलें मनमानी
गंतव्यों के पथ का कण कण होने लगता तब बाधक है bilkul sahi....

फिर भी प्रति पल दौड़ लगाये ये मन उसी कठिन डगर पर

बवाल said...

उस नगरी के गलियारों में सम्बन्धों की लुटती पूँजी
जहाँ स्वार्थ की दूकानों पर भाव बिका करते हैं सस्ते.

Kitnee sunder baat rakesh jee. Aaj subah subah aap aashirvad swaroop padhne mile sir. Din dhanya hua aaj mera. Is aanand ko aaj sameerlal saheb ke saath milkar uThaoonga. Pranaam.

परमजीत बाली said...

जीवन भरा विसंगतियों से ज्ञात मुझे है तुम भी जानो
पंथ समन्वय के पर चलते रहना होता आवश्यक है
समतल राहों पर बोयी जाती हैं जब फ़सलें मनमानी
गंतव्यों के पथ का कण कण होने लगता तब बाधक है

बहुत बढिया रचना है।बधाई।

Dr. Amar Jyoti said...

'लेकिन आदत की लाचारी…'
बहुत सुन्दर चित्रण किया है मानव के स्वभाव का।
बधाई।

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब भाई जी !

नीरज गोस्वामी said...

रहा सूत भर दूर सदा ही, अथक प्रयासों का हर प्रतिफ़ल
निष्ठा देती किन्तु दिलासा, है कर्मण्यवाधिकारस्ते
अद्भुत रचना.....कुछ शब्द हमें उधार देदें राकेश जी सारा जखीरा आप ने अपने पास ही रख छोड़ा है....वाह...
नीरज

Shar said...

शब्दों में जब सिमट न पाईं अन्तर्मन में उगी व्यथायें
तब हमने उल्लास बिखेरा है राहों में गाते हँसते
है कर्मण्यवाधिकारस्ते !
=========
आपके इस भाव को नमन कविवर !

योगेन्द्र मौदगिल said...

बहुत खूब बहुत सुंदर मनभावन रचना बधाई

poemsnpuja said...

राकेश जी, आपकी कविताओं की क्या तारीफ़ करूँ कुछ समझ नहीं आता. अचानक शब्द बहुत छोटे लगने लगते हैं. बस नमन करती हूँ...आप बहुत अच्छा लिखते हैं. विरह की ये कविता अंतर्मन को स्पर्श करती है...छंदबद्ध कविता मुझे अपनेआप में किसी जादू से कम नहीं लगती, उसपर ऐसे भावः. इतना खूबसूरत मेल बहुत कम देखने को मिलता है. आपके ब्लॉग का follower बटन नहीं दिखा.sorry galti se kai baar post ho gaya tha.

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