गंध की रागिनी

आपका स्पर्श पा और मदमय हुई
प्रीत पीती हुई जगमगा चाँदनी

आपके पांव छूकर बढ़ा इस तरफ़
संदली एक झोंका महकता हुआ
था अलक्तक के रंगों से भीगा हुआ
इसलिये रंग वादी में भरता हुआ
छेड़ता शाख पर पत्तियों को मचल
एक चुम्बन कली के जड़ा गाल पर
फिर बजाने लगा जलतरंगें मधुर
बाग के बीच बैठे हुए ताल पर

फूल की क्यारियाँ छेड़ने लग गई
गंध की एक मादक मधुर रागिनी

आपके केश से उठ घटा सावनी
छाई अंबर में जब ले के अँगड़ाईयाँ
खुश्बुओं से दिशायें महकने लगीं
गीत गाने लगीं झूम परछाइयाँ
चातकों के हुए स्वप्न साकार सब
सीपियां मौक्त-श्रॄंगार करने लगीं
यज्ञ की भूमि पर एक कदली तरू
से महकती हुई लौ उमड़ने लगी

वेद की कुछ ॠचायें लगीं झूमने
आपके कंठ की हो के अनुगामिनी


आपकी उठ गई जो पलक तो छिटक
कर गिरी, गुनगुनी धूप दालान में
जितने साये खड़े बुर्जियों पर छुपे
गुम हुए वे सभी अपनी पहचान में
बात दीवार से चौक करने लगा
खिड़कियाँ झाँक कर देखती रह गईं
पौलियां देहरी, खनखनाते हुए
बात गलियों के कानों में कहती रहीं

ईर्ष्या से जली, आपको देखकर
खोल नभ के झरोखे, चपल दामिनी

आपके मुख से दीपित हुई जो निशा
रात पूनम की जैसे लगा आ गई
आपकी चूनरी जो हवा में उड़ी
तो गगन पर सितारों की रुत छा गई
तैरने लग गईं नभ की मंदाकिनी
में हजारों उमंगों की नौका सजी
भोर के द्वार से सोलह श्रॄंगार कर
एक शहनाई फिर राग से बंध बजी

बाग कर आरती कर रहे हैं स्तुति
एक तुम ही बहारों की हो स्वामिनी

5 comments:

रजनी भार्गव said...

बात दीवार से चौक करने लगा
खिड़कियाँ झाँक कर देखती रह गईं
पौलियां देहरी, खनखनाते हुए
बात गलियों के कानों में कहती रहीम
बहुत ही सुन्दर उपमाएँ हैं, बहुत अच्छी लगी.

परमजीत बाली said...

राकेश जी, बहुत बेहतरीन रचना है।

आपके मुख से दीपित हुई जो निशा
रात पूनम की जैसे लगा आ गई
आपकी चूनरी जो हवा में उड़ी
तो गगन पर सितारों की रुत छा गई

Udan Tashtari said...

आपके मुख से दीपित हुई जो निशा
रात पूनम की जैसे लगा आ गई
आपकी चूनरी जो हवा में उड़ी
तो गगन पर सितारों की रुत छा गई


--वाह, हमेशा की पुनः एक बेहतरीन रचना, बधाई!

Suresh Chiplunkar said...

एक उम्दा रचना.. इसी तरह हमें भिगोते रहें :)

मोहिन्दर कुमार said...

राकेश जी,
आपके गीतों की मधुरता देखते ही बनती है.. आपका की एक कविता आप के स्वर में सुनी थी... पास वाली झोपडी से गांव का व्यवहार क्या हो... उसके बाद आप ने अपने गीत को स्वर क्यों नही दिया.. हमे प्रतीक्षा रहेगी

छेड़ता शाख पर पत्तियों को मचल
एक चुम्बन कली के जड़ा गाल पर
फिर बजाने लगा जलतरंगें मधुर
बाग के बीच बैठे हुए ताल पर
चातकों के हुए स्वप्न साकार सब
सीपियां मौक्त-श्रॄंगार करने लगीं
यज्ञ की भूमि पर एक कदली तरू
से महकती हुई लौ उमड़ने लगी

सुन्दर रस विभोर करती पंक्तियां

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...