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Showing posts from October, 2015

कुछ आड़ी तिरछी रेखायें

जीवन के कोरे पृष्ठों परलिये हाथ में एक पेंसिलरोजाना खींचा करते हैंहम सम्बन्धों की रेखायेंकोई आड़ी,कोई तिरछी,कोई वर्तुल,कोई तिर्यककुह लगती हैं निकट,औरकुछ दृष्टि परस भी कर न पायेंजाने किस उंगली की थिरकनखींचेगी रेखायें कैसीकौन रंग भरता जायेगाकुछ होंगी खींचे बिन जैसीकौन उतर जायेगी मन केकागज़ पर आकर के गहरेकिसकी परिणति होगी केवलप्रथम बिन्दु पर ही जा ठहरेकरता कोई और नियंत्रितअनदेखे अनजाने इनकोअक्सर यह सोचा करते हैंकभी पार उसकी पा जायेंधुंधलाई सी दिखीं कभी कुछकुछ दिखतीं  दर्पण सी उजलीकुछ को घेरे हुए कुहासे कुछ कौंधी बन बन कर बिजली कुछ सहसा मिल गईं हथेली की रेखाओं से अनचाहेऔर कई की रही अपेक्षाहर पल कोई उन्हें सराहे त्रिभुज चतुर्भुज के कोणों सेजुड़ीं, उलझती ज्यामितियों मेंलगता है हर बार नया इकसमीकरण ये रचती जायेंबान्धे हुए लगा रखती हैंबनी डोर यह उजियारे कीकरती सदा नियंत्रित गतियाँसूरज चन्दा की तारों कीउगी   भोर से ढली सांझ तकजकड़े हुए पलों की गठरीकभी लगे ये द्रुतगतिमय हैंकभी कहीं  पर रुक कर ठहरीजब भी हुई अपेक्षा विधु कीबनें विभायें कुछ रेखायेंतब तब अम्बर के कागज़ परखिंच  जाती बन कर शम्पायें

अनुबन्ध थे परछाईयों के

सांस का ऋण बढ़ रहा है सूत्र कुछ नूतन बना करकम नहीं होता तनिक भी चाहे जितना भी घटायेंएक प्रतिध्वनि कान में आकर निरन्तर गूँजती हैचेतना जब चीन्ह न पाती तो परिचय पूछती हैउत्तरों के पृष्ठ कोरे, सामने आकर उभरतेऔर गुत्थी, गुत्थियों से ही पहेली बूझती हैप्रश्न के जब उत्तरों में प्रश्न ही मिलते रहे होंउत्तरों को उत्तरों की हैं कहाँ संभावनायेंगल्प सी लगने लगी हर इक कथा सौगंध वालीटोकरी, संबंध के धागों बुनी है आज खालीजो हुए अनुबन्ध, वे अनुबन्ध थे परछाईयों केउड़ गई कर्पूर बन कर आस ने जो आस पालीरेत के कण आ सजाते हाथ के रेखागणित कोबिन्दुओं के बीच उलझी रह गई हैं कल्पनायेंदॄष्टि  को सीमित किये अपराधिनी बाधायें आकरसरगमों की तान पकड़े मौन हँसता खिलखिलाकरकक्ष की घड़ियाँ थकीं, विश्रान्तो ओढ़े सो गई हैंरक्तवर्णी हो रहा एकान्त  का मुख तमतमाकरपंथ पर फ़ैले हुए हैं केश बस तम के  घनेरेभूल जाते राह सपने, नयन आ कैसे सजायें

मेरी आतुर आंखों में हैं

मेरी आतुर आंखों में हैं, रेखाचित्र उन्हीं सपनो केजिनमें उगते हुये दिवस की धूप खिली रहती सोनहली
अम्बर में तिरते बादल से प्रतिबिम्बित होती कुछ किरणेंरच देती हैं दूर क्षितिज पर सतरंगी इक मधुर अल्पनाजिनमें अंकित हुई बूटियाँ नई कथाये जन्मा करतीउस स्थल से आगे हो जाती जहाँ सहज अवरुद्ध कल्पना
वे अनकहे कथानक मेरी सुधियों के द्वारे पर आकरअकसर बन जाया करते हैं पंक्ति गीत की मेरे पहली
बदल रहे  मौसम की करवट परिवर्तित करने लगती हैपुरबाई को छूकर, उत्तर दिशि से आती सर्द हवायेंउस पल सिहरे भुजपाशों में  एक सुखद अनुभूति सहज आजिसकी अँगड़ाई से जागा करती है< सहस्त्र शम्पायें
मेरी आतुर आंखों में है  चित्र  उसी  की  परछाई  केजिसके दृष्टि परस की खातिर रहती व्यग्र आस इक पगली
चलते चलते घिरी भीड़ में बढ़ने लगा एकाकीपनगूंजा करते हैं उस क्षण में मौन हुये सन्नाते के सुरउनसे बन्धी हुई सरगम की लहरी में अठखेली करतेआरोहों की अवरोहों की सीढ़ी पर चढ़ते दो नूपुर
मेरी आतुर आंखों में हैं झिलमिल करते वे ही नूपुरजिनको छूते ही मावस की रंगत भी होती रोपहली

चित्र थे जितने

घुल गए परछाइयों में चित्र थे जितने

प्रार्थना में उंगलियाँ जुडती रहींआस की पौधें उगी तुड्ती रहींनैन छोड़े हीरकनियाँ स्वप्न कीजुगनुओं सी सामने उड़ती रहीं

उंगलियाँ गिनने न पाईं  दर्द थे कितने


फिर हथेली एक फ़ैली रह गईआ कपोलों पर नदी इक बह गईटिक नहीं पाते घरोंदे रेत  केइक लहर आकर दुबारा कह गई


थे विमुख पल प्राप्ति के सब,रुष्ट थे इतने


इक अपेक्षा फिर उपेक्षित हो गईभोर में ही दोपहर थी सो गईसावनों को लिख रखे सन्देश कोमरुथली अंगड़ाई आई धो गई

फिर अभावों में लगे संचित दिवस बंटने