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Showing posts from October, 2014

अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

कक्ष में बैठी हुई पसरी उदासी जम कर शून्य सा  भर गया है  आन कर निगाहों मेंऔर निगले है  छागलों को प्यास उगती हुईतृप्ति को बून्द नहीं है  गगन की राहों मेंफ़्रेम ईजिल पे टँगा है  क्षितिज की सूना सारंग कूची की कोई उँगली भी न छू पाते हैंइन सभी को नये आयाम मिला करते हैं
अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं
लेके अँगड़ाई नई पाँव उठे मौसम केसांझ ने पहनी नई साड़ी नये रंगों कीफिर थिरकने लगी पायल गगन के गंगातटचटखने लग गई है धूप नव उमंगों कीदिन की आवारगी में भटके हुये यायावरलौट दहलीज पे आ अल्पना सजाते हैंइक नई आभ नया रूप निखर आता है
अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं



पंचवटियां हुई हैं आज सुहागन  फिर से अब ना मारीच का भ्रम जाल फ़ैल पायेगा रेख खींचेगा नहीं कोई बंदिशों की अब कोई न भूमिसुता को नजर लगाएगा शक्ति का पुञ्ज पूज्य होता रहा हर युग मेंबात भूली हुई ये आज फिर बताते हैं हमें ये भूली धरोहर का ज्ञान देते हैं
अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

रिश्ता क्या है तुमसे मेरा

तुमने मुझसे प्रश्न किया है रिश्ता क्या है तुमसे मेरासच पूछो तो इसी प्रश्न ने मुझको भी आ आ कर घेरातुम अपनी वैयक्तिक सीमा के खींचे घेरे में बन्दीमैं गतिमान निरन्तर, पहिया अन्तरिक्ष तक जाते रथ कातुम हो सहज व्याख्य निर्देशन बिन्दु बिन्दु के दिशाबोध कालक्ष्यहीन दिग्भ्रमित हुआ मैं यायावर हूँ भूला भटकातुम अंबर की शुभ्र ज्योत्सना, मैं कोटर में बन्द अँधेरासोच रहा हूँ मैं भी जाने तुमसे क्या है रिश्ता मेरातुम प्रवाहमय रस में डूबी, मधुशाला की एक रुबाईमैं अतुकान्त काव्य की पंक्ति, जो रह गई बिना अनुशासनमैं कीकर के तले ऊँघता जेठ मास का दिन अलसायातुम अम्बर की हो वह बदली, जो लाकर बरसाती सावनतुम संध्या का नीड़, और मैं जगी भोर का उजड़ा डेराप्रश्न तुम्हारा कायम ही है तुमसे क्या है रिश्ता मेरालेकिन फिर भी कोई धागा, जोड़े हुए मुझे है तुमसेहम वे पथिक पंथ टकराये हैं जिनके आ एक मोड़ परएक अजाना सा आकर्षण हमें परस्पर खींच रहा हैसमझा नहीं, कोशिशें की हैं गुणा भाग कर घटा जोड़ करप्रश्न यही दोहराता आकर हर दिन मुझसे नया सवेराजो तुमने पूछा है रिश्ता क्या है तुमसे बोलो मेरा

जब मैं गीत नया जाता हूँ.

ऋषि वशिष्ठ का विशद ज्ञान ले
 विश्वानित्री स्वाभिमान से जिसने समदर्शी कर जोड़ा गीता बाइबिल और कुरान से जो मेरा संस्कार बन गई  वही ऋचाएं दोहराता हूँ जब मैं गीत नया जाता हूँ.
सूरा  मीरा  के  इकतारे  में  आल्हाद  पिरोती सरगमएक अलौकिक मधुर प्रीत में डूबा महक रहा वृन्दावनकालिन्दी की, चरण कमल को छूकर पुलकित होती लहरेंगोकुल से मथुरा के पथ पर नित्य बिखरता दधि औ’ माखन
मुरली की मादक धुन वालीबरसाने की रुनझुन वालीपुष्प सेज पर चँवर डुलातेबलखती कदम्ब की डालीआँखो में जो आन बस गई, वही चित्र में रंग जाता हूँजो मेरा संस्कार बन गई, वही ऋचायें दुहराता हूँजब मैं गीत नया गाता हूँ
सन्दीपन के आश्रम में जो कृष्ण सुदामा में थी जोड़ीजिसने धधक रहे इक शर से सागर की सारी ज़िद तोड़ीजिसके लक्ष्य भेद होकर अंगुष्ठहीन भी रहे अचूकेजिसके तप ने उलझी उलझी शिव शंकर की जटा निचोड़ी
मुनि अगस्त्य के सिन्धु पान परभागीरथ के अनुष्ठान परजिसकी गाथायें विस्तृत हैंपुष्पक की मनगति उड़ान परजो नस नस में आन बस गईं, वही कथायें पढ़ पाता हूँजो मेरा संस्कार बन गई , वही ऋचाएं दोहराता हूँ फिर मैं गीत नया गाता हूँ
जो करती इतिहास सुगन्धित तानसेन की मृदु तानों …

कोई भी अनुबन्ध नहीं है

कहने को तो लगा कहीं पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं हैफिर भी जाने क्यों लगता है हम बिल्कुल स्वच्छन्द नहीं हैंघेरे हुए अदेखी जाने कितनी ही लक्षमण रेखायें पसरी हुई पड़ीं हैं पथ में न जाने कितनी झंझायेंपंखुरियों की कोरों पर से फ़िसली हुई ओस की बूँदेंअकस्मात ही बन जाती हैं उमड़ उमड़ उफ़नी धारायेंहँस देता है देख विवशता, मनमानी करता ये मौसमकहता सुखद पलों का तुमसे कोई भी अनुबन्ध नहीं हैबोये बीज निरंतर नभ में,सूरज चाँद नहीं उग पातेयह तिमिराँचल अब बंजर है, रहे सितारे आ समझातेमुट्ठी की झिरियों से सब कुछ रिस रिस कर के बह जाता हैभग्न हुई प्रतिमा के सम्मुख व्यर्थ रहे हैं शीश नवातेजो पल रहे सफ़लताओं के, खड़े दूर से कह देते हैंपास तुम्हारे आयें क्यों जब तुमसे कुछ सम्बन्ध नहीं हैपरिभाषित शब्दों ने जोड़े नहीं तनिक परिचय के धागेजो था विगत बदल कर चेहरा हुआ खड़ा  है आकर आगेविद्रोही हो गये खिंचे थे आयत में जो बारह खानेदरवाजे पर आकर पल पल साँस साँस  मज़दूरी मांगेसोंपे गए मलय के हमको मीलों फैले गहन सघन वनकितनी बार गुजर कर देखा कहीं  तनिक भी गंध नहीं है