लेखनी का प्रश्न

आज यह लेखनी प्रश्न करने लगी
गीत किसके लिये मैं लिखूँ तुम कहो
जब भी स्याही उबलने लगी है मेरी
तुमने मुझसे कहा, धैर्य रख चुप रहो

चुप रही आज तक बात मैं मान कर
तुम ही बतलाओ हासिल मुझे क्या हुआ
तुम युधिष्ठिर बने हारते जा रहे
भीष्म के सामने हो रहा है जुआ
आज अभिमन्यु के साथ में उत्तरा
युद्ध से पूर्व ही हत हुए जा रहे
और तुम आँख पर पट्टियाँ बाँध कर
शांति हो शांति हो ! बस खड़े गा रहे

भीरु कहलाओगे तुम, विदित ये रहे
मौन अन्याय यदि और ज्यादा सहो
प्रश्न दोहरा रही हूँ ये, उत्तर मिले
गीत किसके लिये मैं लिखूँ तुम कहो

ओढ़ आदर्श, ले प्रण, जिन्हे जी रहे
खोखले हो चुके कितना दोहराओगे
फन कुचलने को विषधर का, है ये घड़ी
और कब तक स्वयं को यूँ डँसवाओगे
दूध तुमने पिलाया, चलो ठीक है
आस्तीनों में पालो ये अच्छा नहीं
जनमेजय हो, चुनौती को स्वीकार लो
जो लड़ा कर सका अपनी रक्षा वही

प्रेम की भाईचारे की सीमा रखो
भावना में उलझ अब न ज्यादा बहो
प्रश्न कायम है अपनी जगह पर अभी
गीत कैसे लिखूँ आज मुझसे कहो

एक पल फिर ठिठक, लेखनी ने कहा
संस्कॄति में हमारी क्षमा धर्म है
किन्तु उत्पातियों का करें नाश हम
शास्त्रों ने कहा है ये सत्कर्म है
तुमको चुननी स्वयं आज अपनी दिशा
कॄष्ण हर एक युग में उतरता नहीं
मीन को मार पाये बिना मुद्रिका
भाग्य, शाकुन्तलों का सँवरता नहीं

रह गये तुम निरुत्तर अगर आज भी
मैं भी चुप हो रहूँ सर्वदा, ये न हो
गीत कैसे लिखूँ, किसकी खातिर लिखूँ
या लिखूँ ही नहीं आज मुझको कहो.

Comments

Anonymous said…
I like it! Keep up the good work. Thanks for sharing this wonderful site with us.
»
Nirmal said…
आज यह लेखनी प्रश्न करने लगी
गीत किसके लिये मैं लिखूँ तुम कहो
जब भी स्याही उबलने लगी है मेरी
तुमने मुझसे कहा, धैर्य रख चुप रहो
Wonderful! Of all the poems I have read today, these lines are most meaningful ones!! Bravo!
This is what is expected of you! You are a man with GOLDEN WORDS, do not let them go waste!!

दूध तुमने पिलाया, चलो ठीक है
आस्तीनों में पालो ये अच्छा नहीं
जनमेजय हो, चुनौती को स्वीकार लो
जो लड़ा, कर सका अपनी रक्षा वही
Too good! I am floored!!

तुमको चुननी स्वयं आज अपनी दिशा
कॄष्ण हर एक युग में उतरता नहीं
मीन को मार पाये बिना मुद्रिका
भाग्य, शाकुन्तलों का सँवरता नहीं
Super!!

रह गये तुम निरुत्तर अगर आज भी
मैं भी चुप हो रहूँ सर्वदा, ये न हो
गीत कैसे लिखूँ, किसकी खातिर लिखूँ
या लिखूँ ही नहीं आज मुझको कहो.
Thanks for such a meaningful poem!

This gives a glimpse of what happens when a saint gets angry!!

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