चाह मेरी है उस डलिया की

तुम जिस डलिया में उपवन से लाती हो फूलों को चुनकर
चाह मेरी है उस डलिया की मैं बन जाऊँ एक किनारी
 
त्रिवली का मधुपरस सहज ही लिखे मेरी किस्मत की रेखा
उंगलियों का परस सुधा बन करे प्राण संचार शिरा में
क्रम से फूलों के रखने में बार बार सौजन्य तुम्हारा
सुरभि घोलता रहे निरन्तर मेरी इस अनयनी गिरा में
 
मैं शतगुणी पुलक से भर लूँ, छू ले साड़ी मुझे तुम्हारी
चाह मेरी है उस डलिया की मैं बन जाऊँ एक किनारी
 
जगी भोर में सद्यस्नात तुम चलो किये श्रंगार समूचे
और हाथ में मुझे उठाओ, स्वप्न निशा के ले नयनों में
फूलों पर पड़ गई ओस से वे जब हो लेंगे प्रतिबिम्बित
मैं पा लूँगा कुछ् आभायें मीत उस घड़ी सब अयनों में
 
लालायित हो रहें परस को अलकापुरियों की फुलवारी
चाह मेरी है उस डलिया की मैं बन जाऊँ एक किनारी
 
जब गुलाब को थामो उस पल सारे कांटे होकर कोमल
चाहा करते पा जायें वे जीवन नया फूल बनने को
पत्ती पत्ती की आतुरता, छू पाये मेंहदी का बूटा
और तपस्यायें कलियों की केशों में जाकर सजने को
 
ये सारी अतृप्त कामनायें आ नस नस में संचारी
चाह मेरी है उस डलिया की मैं बन जाऊँ एक किनारी

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

श्रंगार की अनछुयी पंखुड़ी

Udan Tashtari said...

कितनी प्यारी और कोमल सी चाह- बन जाऊँ एक किनारी!

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