चाहिये था क्या हमें, ये सोचते ही रह गये

कल्पना के पृष्ठ शब्द खोजते ही रह गये
चाहिये था क्या हमें, ये सोचते ही रह गये
 
प्रश्न तो हजार रोज भोर सांझ उठ रहे
किसलिये हवाओं की गली में स्वप्न लुट रहे
रख रही उमीद जिस सिरे से डोर बान्ध कर
जा रहा है किसलिये वही सुदूर चाँद पर
बो रहीं दिलासे नित्य सैकड़ों ही क्यारियाँ
दूर दृष्टि से रही हैं रोशनी की बारियाँ
ज्ञात था हमें कि ये सदा उधेड़ बुन रहे
किसलिये उन्हें ही बार बार सभी चुन रहे
 
ये व्यथा नहीं अकेले एक गांव देश की
बात हर गली,शहर की है हर इक प्रदेश की
दृष्टि के वितान चित्र खोजते ही रह गये
चाइये था क्या हमें ये सोचते ही रह गये
 
हुआ प्रतीत चाह कोई मन में गुनगुना रही
अपेक्षितों के पंथ में खड़ी हो गीत गा रही
मगर जुड़ा नहीं कभी भी परिचयों का सिलसिला
रहे गणित ले जोड़ते किसे मिला है क्या मिला
ना भाव हम समर्पणों के आंजुरी में भर सके
सुलह कभी परिस्थिति से एक पल न कर सके
जवाब पास में रहे सवाल ढूढ़ते रहे
कभी हमारे दर्प के किले जरा नहीं ढहे
 
धूप को मरुस्थलों में दी चुनौती दोपहर
कँपकँपाये जब उगा था भोर का प्रथम प्रहर
थे हमारे तर्क जोकि टोकते ही रह गये
चाहिये था क्या हमें ये सोचते ही रह गये 

1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सफ़ेद भेड़ - काली भेड़ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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