मुझको याद तुम्हारी आई

रश्मि भोर की खोल खिड़कियां जब भी मेरे कक्ष में आई
कोयल ने सरगम के सुर से गुण्जित की जब जब अमराई
हरी दूब पर पड़ी बूँद से होते प्रतिबिम्बित रंगों ने
जब जब दीवारों पर जड़ दी कोई धुंधली सी परछाईं
 
जब बहार का चुम्बन पाकर कोई कली कभी मुस्काई
मुझको याद तुम्हारी आई
 
पगडंडी पर बैठ गये जब दोपहरी के पल अलसाये
जब पनघट को पैंजनियों ने मद्दम स्वर में गीत सुनाये
जब जब छुई हिनाई आभा ने पूजा की सज्जित थाली
अनायास ही बेमौसम के बादल जब नभ पर घिर आये
 
छेड़ गई आ अलगोजे को जब कोई महकी पुरबाई
मुझको याद तुम्हारी आई
 
शतधन्वा के शर से बिंध कर जब भी मौसम बहका बहका
सुमन वाटिका में वनपाखी जब भी कोई आकर चहका
दोपहरी में बेला फूला  , महकी निशिगंधा सन्ध्या में
और देहरी के गमले में जब पलाश कोई भी दहका
 
लगी तोड़ने जेठ छोड कर नींद एक अलसी  अंगड़ाई
मुझको याद तुम्हारी आई

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जब स्मृति बलवती होती है, सारे प्रतीक बोलने लगते हैं।

तुषार राज रस्तोगी said...
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मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...