मातृ दिवस पर

अपने आरम्भ से आज तक यह समय नित्य रचता रहा है महाकाव्य नव
शब्द के कोश में शब्द नूतन रचे जा रहा हर निमिष और हर इक घड़ी
किन्तु असमर्थ है तेरी स्तुति कर सके या कि महिमा तेरी माँ बखाने तनिक
इक सहस्रांश भी तो सिमट न सका अनवरत अक्षरों की लगा कर झड़ी.

4 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन के माँ दिवस विशेषांक माँ संवेदना है - वन्दे-मातरम् - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

तुषार राज रस्तोगी said...

बहुत खूब |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
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प्रवीण पाण्डेय said...

सच भाव प्रकट किये हैं, शब्द कम पड़ जाते हैं।

Udan Tashtari said...

अभिनन्दन!!

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...