पॄष्ठ रिक्त रह गया ना गीत कोई ढल सका

 

उदास रात चाँद के बिना उदास रह गई
 राह ताकती कली मधुप की, मौन रह गई
 सावनी घटाओं की हुई गगन से दुश्मनी
गंध लुट गई हवायें कर गईं थी रहजनी
 
इसलिये न शब्द कोई लेखनी को मिल सका
पॄष्ठ रिक्त रह गया ना गीत कोई ढल सका
 
धड़कनों पे जो बना रहे थे नित दिवस निशा
वो श्वेत श्याम चित्र था, ना रंग कोई भर सका
खिंची जो रेख धूप छू के धूमिली हो रह गई
न शेष है यहां कभी, पथिक हो राह कह गई
 
चलीं हैं यात्रायें बिन रुके, ना पांव चल सका--
पॄष्ठ रिक्त रह गया ना गीत कोई ढल सका
 
हथेलियाँ सपाट हो बनी रहीं थीं आईना
पल रहा जो सामने आ वो रहा था अनमना
खिड़कियों पे बोझ बन रुके थे साये सांझ के
रही थी रात शून्य के सपन को रोज आँजते
 
ना आज के लिये , गया उदाहरण हो कल सका
पॄष्ठ रिक्त रह गया ना गीत कोई ढल सका
 
थरथरा गईं अधर को आके सकपकाहटें
कंठ से उभर नहीं सकीं ह्रदय की चाहतें
सरगमें न जुड़ सकी थी अक्षरों की छांव से
रह गये पगों के चिह्न दूर अपने पांव से
 
तीलियाँ जलीं बहुत न दीप कोई जल सका
रिक्त पृष्ठ रह गये न गीत कोई ढल सका
 
झालरी हवाओं की थी आंधियाँ बनी उड़ी
सावनी फ़ुहार बाढ़ बन के इस तरफ़ मुड़ी
बून्द ओस की जला गई समिइची दूब को
भोर खिलखिलाये पीके ना पाई धूप को
 
पालने में नैन के था स्वप्न एक पल सका
पॄष्ठ रिक्त रह गया ना गीत कोई ढल सका

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अद्भुत अभिव्यक्ति..कई बार पढ़ा, मन न भरा।

Udan Tashtari said...

जबरदस्त!!....आनन्द...आया...अभिभूत.


कोशिश की कि फोन पर बात हो पाये...रविवार घर पर लगाया था...


कल दफ्तर में कोशिश करुँगा...

शारदा अरोरा said...


हथेलियाँ सपाट हो बनी रहीं थीं आईना
पल रहा जो सामने आ वो रहा था अनमना
bahut badhiya ...prishthh to rikt ho kar bhi rikt n rahaa..

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