भोर ने फिर ओस धर दी

सूख ना  पाई निशा की अश्रुओं से सिक्त चादर
भोर ने फिर  ओस धर दी ला पलक की पांखुरी पर 
 
आई देहरी लांघ कर जब पीर की दुल्हन निकेतन
साथ में शत जन्म के अनुबन्ध की गठरी लिये थी
मोमबत्ती के पिघल कर बून्द बनने की क्रियाको 
स्वर्ण अक्षर में पिरो कर हाथ पर अंकित किये थी
 
कक्ष के वातायनों के खोल कर जब पाट देखा
आंधियों ने चौखटे में नैन  के ला धूल  दी भर 
 
उम्र के गुलमोहरों का बिन खिले झरना रहा तय
आँजुरी को रिक्त ही रहना रहा होकर सुनिश्चित
उग रहे दिन के स्वरों को पी गयीं खामोशियां बढ़
दृष्टि का विस्तार था होकर रहा बस बिन्दु निर्णित
 
दे रही थी गर्व हमको पूर्वजों की संचयित निधि
हो गई क्षय पास आते  संस्कृतियों की धरोहर
 
नैन के जल से रहीं सिंचती अधर की क्यरैयों नित
दे नहीं पाईं कभी मुस्कान की कलियाँ खिला कर
रहे गये थे कंठ में उमड़े हुए स्वर घुट ह्रदय के
मौन वाणी कह न पाई राग कोई गुनगुनाकर
 
तार पर सारंगोयों के उंगलियाँ दौड़ी  थके बिन 
एक भी फल सरगमों का डाल से उतारा नहीं जहर 
 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अद्भुत भाव..
भोर ने फिर से भिगोया..

Udan Tashtari said...

कक्ष के वातायनों के खोल कर जब पाट देखा
आंधियों ने चौखटे में नैन के ला धूल दी भर

-शानदार मान्यवर...कल फोन लगाता था...बात न हो सकी...कल लगाऊँगा पुनः

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