नयनों के कागज़ पर सपने लिखते आकर नित्य कहानी
नई स्याहियां नया कथानक, बातें पर जानी पहचानी
नदिया का तट, अलसाया मन और सघन तरुवर की छाया
जिसके नीचे रखा गोद में अधलेटे से प्रियतम का सर
राह ढूँढ़ती घने चिकुर के वन में उलझी हुई उंगलियां
और छेड़तीं तट पर लहरें जलतरंग का मनमोहक स्वर
और प्यार की चूनरिया पर गोटों में रँग रही निशानी
भीग ओस में बातें करती हुई गंध से एक चमेली
सहसा ही यौवन पाती सी चंचल मधुपों की फ़गुनाहट
नटखट एक हवा का झोंका, आ करता आरक्त कली का
मुख जड़ चुम्बन, सहसा बढ़ती हुई अजनबी सी शरमाहट
और मदन के पुष्पित शर से बिंधी आस कोई दीवानी
मांझी के गीतों की सरगम को अपने उर से लिपटाकर
तारों की छाया को ओढ़े एक नाव हिचकोले खाती
लिखे चाँदनी ने लहरों को, प्रेमपत्र में लिखी इबारत
को होकर विभोर धीमे से मधुरिम स्वर में पढ़ती गाती
सुधि वह एक, दिशाओं से है बाँट रही उनकी वीरानी
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नव वर्ष २०२४
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5 comments:
कविता का मधुरिम प्रवाह कविता के माध्यम से व्यक्त।
नयनों के कागज़ पर सपने लिखते आकर नित्य कहानी
नई स्याहियां नया कथानक, बातें पर जानी पहचानी
... bahut sundar !!!
राकेश जी
कविता पढ़ कर मन एकदम निर्मल हो गया। समय कुछ पलों के लिये ठहर गया।
अखिलं मधुरं!
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