अर्थ हम ज़िन्दगी का न सम

अर्थ हम ज़िन्दगी का न समझे कभी
दिन उगा रात आई निकलती रही
उम्र  थी मोमबत्ती जली सांझ की
रात के साथ लड़ते पिघलती रही
मुट्ठियाँ बाँध कर प्राप्त कर पायें कुछ
हाथ आगे बढ़े छटपटाते रहे
जो मिला साथ, याचक बना था वही
आस सूनी निरन्तर कलपती रही
 
हम न कर पाये अपनी तरफ़ उंगलियाँ
दोष बस दूसरों पर लगाते रहे
अपने दर्पण का धुंआ न देखा जरा
बस कथा तारकों की सुनाते रहे
गल्प की सीढ़ियों पर चढ़ा कल्पना
हम नयन को सजाते रहे स्वप्न से
कर न पाये है श्रॄंगार मुस्कान का
आंसुओं का ही मातम मनाते रहे
 
बोध अपराध का हो न पाया कभी
रश्मियां हमने खुद ही लुटाईं सदा
भेजे जितने निमंत्रण थे मधुमास ने
द्वार से हमने लौटा दिये सर्वदा
लौट आती रहीं रिक्त नजरें विवश
शून्य में डूभ जाते क्षितिज से सदा
सान्त्वना का भुलावा स्वयं को दिया
भाग्य में अपने शायद यही है बदा
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2 comments:

'उदय' said...

कर न पाये है श्रॄंगार मुस्कान का
आंसुओं का ही मातम मनाते रहे
... bahut sundar ... behatreen abhivyakti !!!

प्रवीण पाण्डेय said...

काश पहला प्रश्न स्वयं से पूछा होता।

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर नीड तत्प...