आपके पाँव की झान्झारों से गिरी

चांदनी ओढ़ कर चांदनी रात में आप आये तो परछइयां धुल गई
आपके पाँव की झान्झारों से गिरी जो खनक ,मोतियों में वही ढल गई
भोर की वे  किरण दिन  पे ताला लगा,थी डगर पर गई सांझ की घूमने
आपको देखने की उमंगें संजो,रात की वे बनी  खिड़कियाँ खुल गई
 
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxn
 
भोजपत्रों पे लिक्खे हुए मंत्र थे,ओस बन कर गिरे शतदली पत्र पर
शिव तपोभंग को एक उन्माद सा छा गया फिर निखरते हुए सत्र पर 
विश्वामित्री तपस्याएँ खंडित हुई आपकी एक छवि जो गगन में बनी 
आपका नाम बन सूर्य की रश्मियाँ हो गई दीप्तिमय आज   सर्वत्र पर  

5 comments:

News Punjabi said...

nice poem i love to read this......
Christmas flowers

प्रवीण पाण्डेय said...

सौन्दर्यपूर्ण अभिव्यक्ति।

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

निर्मला कपिला said...

सौन्द्र्य रस से परिपूर्ण रचना। आपको सारस्वत सम्मान मिलने के लिये एडवांस मे बधाई ।

Harish said...

really very nice and impressive i love to read this..........
flowers for Valentine

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर नीड तत्प...