जब जब भी बहार का झोंका गुजरा उपवन की गलियों से
चूम कपोलों को कलियों के लिख कर जाता नाम तुम्हारा
शाखों पर कोमल पत्तों ने लेकर बासन्ती अँगड़ाई
जब जब अपनी पलकें खोलीं, तब तब स्वप्न हवा में बिखरे
और उमड़ती हुई गंध की एक टोकरी जब छितराई
तब तब धारे बही हवा के, डूब रंग में हुए सुनहरे
अलसाये पल भी उस पल में ऐसे ही प्रतीत होते हैं
जैसे ढली दुपहरी में हो मीत तुम्हारा ही चौबारा
नदिया की धारा से बतियाती हैं जब बरखा की बूंदें
या पनघट पर कलसी बोले कुछ चूड़ी वाले हाथों से
सप्त-स्रोत से संचित होकर अभिमंत्रित होता कहता है
अभिषेकों के पल में जो, जल चढ़ता प्रतिमा के माथों पे
उनके सब शब्दों में सुर में जो कुछ मिला समाहित होकर
उसे प्रीत डूबे अधरों ने ही तो है हर बार उचारा
पवन पालकी में बिठला कर विदा गंध को करता है जब
फूल नहीं कुछ भी कह पाता अधर थरथरा रह जाते हैं
विचलित हो पराग के कण भी जब चल देते पीछे पीछे
उस पल तितली भंवरे आकर जो कुछ उनको समझाते हैं
वे सब कही अनकही बातें और अवर्णित पल हैं जितने
इतिहासों की गाथाओं की उन पर छाप लगी दोबारा
यादों की बारिश में भीगे या सुधियों की धूप सेंकते
मन के आवारा पल आंखों में कुछ चित्र खींच देते हैं
एक विभोरित अनुभूति की चंचल सी अंगड़ाई के पल
दिवास्वप्न की उगती प्यासों को दे नीर सींच देते हैं
अपने हुए एक मुट्ठी भर उन निमिषों की संचित थाती
रहती है अंगनाई में बन, निर्देशन का एक सितारा
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
-
प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
-
हमने सिन्दूर में पत्थरों को रँगा मान्यता दी बिठा बरगदों के तले भोर, अभिषेक किरणों से करते रहे घी के दीपक रखे रोज संध्या ढले धूप अगरू की खुशब...
-
जाते जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया ...
6 comments:
नदिया की धारा से बतियाती हैं जब बरखा की बूंदें
वाह राकेश भाई - जवाब नहीं आपका।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
अलसाये पल भी उस पल में ऐसे ही प्रतीत होते हैं
जैसे ढली दुपहरी में हो मीत तुम्हारा ही चौबारा
--बहुत जबरदस्त!! और हमेशा की तरह- अद्भुत भाई जी!! गजब कर देते हो आप हर बार!
बहुत खूब ..!!
यादों की बारिश में भीगे या सुधियों की धूप सेंकते
मन के आवारा पल आंखों में कुछ चित्र खींच देते हैं
एक विभोरित अनुभूति की चंचल सी अंगड़ाई के पल
दिवास्वप्न की उगती प्यासों को दे नीर सींच देते है
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है और शब्द शिल्प लाजवाब है बौत बहुत बधाई
पवन पालकी में बिठला कर विदा गंध को करता है जब
फूल नहीं कुछ भी कह पाता अधर थरथरा रह जाते हैं
विचलित हो पराग के कण भी जब चल देते पीछे पीछे
उस पल तितली भंवरे आकर जो कुछ उनको समझाते हैं
फूल से खुश्बू के चले जाने की व्यथा को बहुत ही सुंदर शब्दों में अभिव्यक्त किया है । पूरा का पूरा शब्द चित्र मानों आंखों के सामने आ गया । बहुत सुंदर ।
विचलित हो पराग के कण भी जब चल देते पीछे पीछे
उस पल तितली भंवरे आकर जो कुछ उनको समझाते हैं
ati sundar....sampurnataa chhote se khand mein :)
Post a Comment