फिर सावन की ॠतु आई है फिर अम्बर पर बादल छाये
केवल एक तुम्हारी यादें, हर उमड़ा बादल बरसाये
मल्हारों में घुल कर गाती हैं जो भीगी हुई हवायें
या रिमझिम झीलों की लहरों से जा जा कर जो बतियाये
संदलबदए ! नाम तुम्हारा है, जिसको चाँदी की रेखा
बनकर कलम श्याम पन्ने पर आ अंबर के लिखती जाये
मीठा सा अहसास उभर कर मुझे बाँह में भरता जाये
केवल एक तुम्हारी यादें, हर उमड़ा बादल बरसाये
खिड़की के शीशे पर नाचा करते इन्द्रधनुष अनगिनती
एक तुम्हारी छवि ही रँग कर निज रंगों में दिखलाते है
बून्दों की दस्तक खोला करती है द्वार नयन के फिर से
जोकि तुम्हारी छवि प्रवेश के बाद स्वयं ही भिड़ जाते हैं
उठी धरा से सौंधी खुश्बू गंध तुम्हारी बन छा जाये
केवल एक तुम्हारी यादें, हर उमड़ा बादल बरसाये
उमड़ी हुई घटायें देती हैं आवाज़ें, खुल जाते हैं
आधे लिखे हुए गीतों की पुस्तक के सारे ही पन्ने
और तुम्हारे चित्रण वाले गीत पूर्ण हौं इससे पहले
छलकी भावों की गागर से नये गीत लगते हैं बनने
लेकिन फिर भी जाने कैसे गीत अधूरा हर रह जाये
केवल एक तुम्हारी यादें हर उमड़ा बादल बरसाये
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5 comments:
:)
bahut hi sundar ehasaaso ki ladiyan hai ........bahut hi sundar
संदलबदए ! नाम तुम्हारा है, जिसको चाँदी की रेखा
बनकर कलम श्याम पन्ने पर आ अंबर के लिखती जाये
-सावनी बयार बह निकली है..:)
चाँदी की रेखा बनी कलम, अंबर के श्याम पन्ने, शीशे पर अनगिन बूंदों में नाचते इन्द्रधनुष, नयन के द्वार होती बून्दों की दस्तक, प्रिय की छवि प्रवेश के बाद स्वयं नयन का मुंदना, आधे लिखे गीत ...
अहा! क्या लेखनी है! क्या कल्पना है ! वाह!
बहुत दिनों बाद आपको लंबा comment लिखने बैठी हूँ :) पढ़ती तो रोज़ ही हूँ :)
सादर शार्दुला
३० जुलाई ०९
लिख कर जाता नाम तुम्हारा. . . :)
और उमड़ती हुई गंध की एक टोकरी . . . ( उसमें बिल्ली?? :) )
नदिया की धारा से बतियाती हैं जब बरखा की बूंदें . . . (मुख चूमती हैं बच्चियाँ माँ का !! )
अभिषकों के पल में जो, जल चढ़ता प्रतिमा के माथों पे . . . (वह आँखों से बहता है!)
=======
ये निशब्द करने वाला !
"पवन पालकी में बिठला कर विदा गंध को करता है जब
फूल नहीं कुछ भी कह पाता अधर थरथरा रह जाते हैं
विचलित हो पराग के कण भी जब चल देते पीछे पीछे
उस पल तितली भंवरे आकर जो कुछ उनको समझाते हैं
वे सब कही अनकही बातें और अवर्णित पल हैं जितने
इतिहासों की गाथाओं की उन पर छाप लगी दोबारा"
यादों की बारिश में भीगे या सुधियों की धूप सेंकते
मन के आवारा पल आंखों में कुछ चित्र खींच देते हैं
एक विभोरित अनुभूति की चंचल सी अंगड़ाई के पल
दिवास्वप्न की उगती प्यासों को दे नीर सींच देते हैं
अपने हुए एक मुट्ठी भर उन निमिषों की संचित थाती
रहती है अंगनाई में बन, निर्देशन का एक सितारा "
निशब्द!
बहुत ही सुन्दर ! कितनी गलत बात है, जब भी कुछ अप्रतिम सा लिखते हैं कि मन तुंरत कुछ कहने को होता है कि उसपे comment की सुविधा नहीं देते ! अगली बार ऐसा किया तो फिर खुद ही लिखियेगा और खुद ही टिप्पणी कीजियेगा :) :)
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