परिणति, जलते हुए तवे पर गिरी हुई पानी की बूँदे
मन की आशा जब यथार्थ की धरती से आकर टकराये
अपने टूटे सपनों की अर्थी अपने कांधे पर ढोते
एकाकीपन के श्मशानों तक रोजाना ले जाते हैं
चुनते रहते हैं पंखुरियां मुरझा गिरे हुए फूलों की
जो डाली पर अंगड़ाई लेने से पहले झर जाते हैं
पथ की धूल निगल जाती है पदचिह्नों के अवशेषों को
सशोपंज में यायावर है, दिशाज्ञान अब कैसे पाये
सजी नहीं है पाथेयों की गठरी कब्से उगी भोर में
संध्या ने दर्वाजा खोला नहीं नीड़ जो कोई बनता
संकल्पों को लगीं ठोकरें देती नहीं दिलासा कोई
उमड़े हुए सिन्धु में बाकी नहीं कहीं पर कोई तिनका
बिखर गये मस्तूल, लहर ने हथिया लीं पतवारें सारी
टूटी हुई नाव सागर में, कब तक और थपेड़े खाये
शूल बीनते छिली हथेली में कोई भी रेख न बाकी
किस्मत के चौघड़िये मे से धुल बह गये लिखे सब अक्षर
बदल गई नक्षत्रों की गति, तारे सभी धुंध में लिपटे
सूरज निकला नहीं दुबारा गया सांझ जो अपने घर पर
अधरों के स्वर सोख लिये हैं विद्रोही शब्दों ने सारे
सन्नाटे की सरगम लेकर गीत कोई कैसे गा पाये
सपने अभ्यागत बनकर अब आते नहीं नयन के द्वारे
खामोशी का पर्वत बनकर बाधा खड़ा हुआ आंगन में
अभिलाषा का पथ बुहारते क्षत विक्षत होती हैं साधें
मन मरुथल है, बादल कोई उमड़ नहीं पाता सावन में
पतझर बन कर राज कुंवर, सता ले बैठा सिंहासन पर
संभव नहीं अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये
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10 comments:
पतझर बन कर राज कुंवर, सता ले बैठा सिंहासन पर
संभव नहीं अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये
खूबसूरत भावाभिव्यक्ति राकेश भाई। आपकी रचना के साथ अलग भाव की दो पंक्तियाँ लिखने के लिए हिम्मत जुटा रहा हूँ-
जबतक जीवन है धरती पर यह मुस्कान रहेगी
पतझड़ के संग भले कंस ही सत्ता पर आ जाये
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
:(
Oh! yeh kya aaj?
Soch rahe the aapke blog pe aayenge aur seedhe aapke geet aaj kisi bahana ke aangan le jaayenge.
Aaj ke din aisi kavita !!
Sadar. . .
आज राखी का पावन दिन है भाई, इतने उदास न हो ।
हर काली रात की सुबह होती है,
मौत जीवन को हरा नही सकती,
पतझड के बाद भी वसंत आता है,
हार आदमी को हरा नही सकती ।
एकाकीपन के श्मशानों तक रोजाना ले जाते हैं
?
सजी नहीं है पाथेयों की गठरी कबसे उगी भोर में
संध्या ने दरवाज़ा खोला नहीं नीड़ जो कोई बनता
संकल्पों को लगीं ठोकरें देती नहीं दिलासा कोई
उमड़े हुए सिन्धु में बाकी नहीं कहीं पर कोई तिनका
?
बदल गई नक्षत्रों की गति, तारे सभी धुंध में लिपटे
सूरज निकला नहीं दुबारा गया सांझ जो अपने घर पर
?
सपने अभ्यागत बनकर अब आते नहीं नयन के द्वारे
खामोशी का पर्वत बनकर बाधा खड़ा हुआ आंगन में
अभिलाषा का पथ बुहारते क्षत विक्षत होती हैं साधें
मन मरुथल है, बादल कोई उमड़ नहीं पाता सावन में
?
पतझर बन कर राज कुंवर, सत्ता ले बैठा सिंहासन पर
संभव नहीं अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये
?
==========
ये लीजिये :) :) :) :)
==========
कविराज आज के शुभ दिन इतना दुखद गीत पोस्ट करने से पहले आपको सोचना चाहिए था कि जो द्वार पे आयेंगे आज, उन्हें क्या यह अवसाद दे के विदा करेंगे आप?
==========
आपके आँगन को अपनी पाठशाला मानते हुए आगंतुकों के लिए ये आशीष प्रेषित कर रही हूँ :
"स्थूल में और सूक्ष्म में सौन्दर्य जो, तुमको समर्पित
व्यक्त और अव्यक्त में सिमटी हुई सारी ऋचायें,
है समर्पित फूल हर, खिलता हुआ जन में,विजन में
और हर रंग के अधर, पा कर खुशी जो मुस्कुरायें ।
. . .
अभिनन्दन तुमको दिवस का !
मिलन हो सुख और सुयश का! "
सादर शार्दुला
संभव नहीं अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये
बहुत खूबसूरत गीत
भाव सुन्दर
मुखरित स्वर
आप ने यथार्थ उकेर दिया है!
रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विश्वभ्रातृत्व विजयी हो!
बहुत सुन्दर और सत्य अभिवयक्ति है आभार राखी की शुभकामनायें
संभव नहीं अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये
kya baat hai,,muskaan ka ankurit hona wahwa!
बहुत ही सुन्दर और मर्मस्पर्शी।
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