इसीलिये मैं मौन रह गया

एक तुम्हारा प्रश्न अधूरा, दूजे उत्तर जटिल बहुत था
तीजे रुंधी कंठ की वाणी, इसीलिये मैं मौन रह गया

बचपन की पहली सीढ़ी से यौवन की अंतिम पादानें
मंदिर की आरति से लेकर मस्जिद से उठती आजानें
गिरजे की घंटी के सुर में घुलती हुई शंख की गूँजें
थीं हमको आवाज़ लगातीं हम आकर उनको पहचानें

लेकिन पिया घुटी में जो था, उसका कुछ प्रभाव ऐसा था
परछाईं में रहे उलझते, और सत्य हो गौण रह गया

लालायित हम रहे हमेशा, आशीषों के चन्द्रहार के
और अपेक्षित रहे बाग के दिन सारे ही हों बहार के
स्वर्ण-पत्र पर भाग्य लिखेगा सदा, हमारा भाग्य नियंता
और कामनायें ढूंढ़ेंगी, रह रह कर हमको पुकार के

जब ललाट पर लगीं उंगलियां, हमने सोचा राजतिलक है
देखा दर्पण में तो पाया, केवल लगा डिठौन रह गया

सदा शीर्ष के इर्द गिर्द ही रहीं भटकतीं अभिलाषायें
और खोजतीं केवल वे स्वर, जो श्रवनामॄत मंत्र सुनायें
पक्षधार हो द्रोण, कर सके, एकलव्य हर एक नियंत्रित
और दिशायें विजयश्री की धवल पताकायें फ़हरायें

जीवन के इस बीजगणित के लेकिन समीकरण सब उलझे
जो चाहा था पूरा हो ले, वो ही आधा-पौन रह गया

जहां लिया विश्राम काल की गति ने एक निमिष को रुककर
थमे हुए हैं जीवन के पल, अब तक उसी एक बिन्दु पर
राजसभा में ज्यों लंका की, पांव अड़ाया हो अंगद ने
या इक राजकुंवर अटका हो, चन्दा को पाने के हठ पर

बारह बरस बदल देते हैं, मिट्टी की भी जर्जर काया
ढूंढ़ रहा हूँ कोई बताये, ये सब बातें कौन कह गया ?

7 comments:

काकेश said...

अच्छी पंक्तियां..

डिठोन मने क्या ??

" बारह बरस बदल देते हैं, मिट्टी की भी जर्जर काया
ढूंढ़ रहा हूँ कोई बताये, ये सब बातें कौन कह गया ? "

यदि ये चिट्ठा जगत के लिये हैं तो अभी 12 बरस नहीं हुए हैं जी..:-)

राजीव रंजन प्रसाद said...

राकेश जी..
आपके गीत पढना गीत लिखने की ट्युशन लेने की तरह है। गीत की रवानगी से भी प्रभावित हूँ।

परछाईं में रहे उलझते, और सत्य हो गौण रह गया

जब ललाट पर लगीं उंगलियां, हमने सोचा राजतिलक है
देखा दर्पण में तो पाया, केवल लगा डिठौन रह गया

पक्षधार हो द्रोण, कर सके, एकलव्य हर एक नियंत्रित
और दिशायें विजयश्री की धवल पताकायें फ़हरायें

जीवन के इस बीजगणित के लेकिन समीकरण सब उलझे
जो चाहा था पूरा हो ले, वो ही आधा-पौन रह गया

इतने सुन्दर गीत को पढवाने का आभार।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Udan Tashtari said...

जीवन के इस बीजगणित के लेकिन समीकरण सब उलझे
जो चाहा था पूरा हो ले, वो ही आधा-पौन रह गया


----बहुत खूब, राकेश भाई.

राकेश खंडेलवाल said...

काकेशजी,

धन्यवाद. डिठौन या डिठौना शब्द उस काले टीके के लिये आंचलिक भाषाओं में है, जिसे नजर बचाने के लिये लगाया जाता है.

राजीव जी एवं समीरजी.

अच्छा लगा जानकर कि आपको प्रयोग पसन्द आये.

Beji said...

बहुत कम ऐसा होता है जब शब्द, भाव और विचार तीनों इतनी खूबसूरती से एक दूसरे का साथ दे....बहुत बहुत सुंदर!!

कंचन चौहान said...

एक तुम्हारा प्रश्न अधूरा, दूजे उत्तर जटिल बहुत था
तीजे रुंधी कंठ की वाणी, इसीलिये मैं मौन रह गया

मुखड़ा ही इतना खूबसूरत है कि कविता में हम बँध जाते है | और फिर....

जहां लिया विश्राम काल की गति ने एक निमिष को रुककर
थमे हुए हैं जीवन के पल, अब तक उसी एक बिन्दु पर
राजसभा में ज्यों लंका की, पांव अड़ाया हो अंगद ने
या इक राजकुंवर अटका हो, चन्दा को पाने के हठ पर

बारह बरस बदल देते हैं, मिट्टी की भी जर्जर काया
ढूंढ़ रहा हूँ कोई बताये, ये सब बातें कौन कह गया ?

तक एक एक शब्द मन को बाँध लेता है, मन बार बार गुनगुनाना चाहता है आपकी प्रत्येक पंक्ति


बहुत ही अच्छा लिखते है आप राकेश जी! सोचती हूँ कि यादि बलॉग जगत में न आती तो आप जैसे लोगो से कैसे मिल पाती और कैसे जान पाती कि कुछ लेखनियों मे हिंदी कविता अब भी जिंदा है

मोहिन्दर कुमार said...

राकेश जी
आप की कविता मेँ एक एक शब्द भावोँ को उसके रूपानुसार जीता प्रतीत होता है
यही आप के लेखन की खासियत है

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...