तुम्हारे कुन्तलों को छेड़ने की चाह

तुम्हारे कुन्तलों को छेड़ने की चाहतें लेकर
हवाओं ने घटाओं से पता पूछा तुम्हारा है

गगन की वीथियों में थीं भटकती भोर से संध्या
लगीं थीं ऊबने कोई न साथी साथ में पाकर
अषाढ़ी एक बदली को गली के मोड़ पर देखा
गईं फिर दौड़ पकड़ी बाँह उसकी पास में जाकर

कहा अब है सुनिश्चित कुछ चिकुर लहरायेंगें नभ में
तुम्हारा आगमन इस बात का करता इशारा है

कई दिन हो गये बेचारगी से हाथ को मलते
नहीं कुछ खेलने को साथ में कोई सहेली है
जरा भी बैठती इक पल नहीं है एक मूढ़े पर
यही है बात शायद इसलिये घूमे अकेली है

तुम्हारा चित्र देखा एक दिन पुरबाई के घर में
तभी से हर गली हर मोड़ पर तुमको पुकारा है

बुलाया चाँदनी को नाम ले लेकर तुम्हारा ही
सुरभि से पूछती हर बार उद्गम है कहाँ बोलो
मचल कर सरगमों की रागिनी से ज़िद किये जाती
कहाँ से तान पाई है जरा ये भेद तो खोलो

सुरभि की, चाँदनी की, रागिनी की स्रोत तुम ही हो
तभी बन याचिका इनको उमंगों से निहारा है

7 comments:

munish said...

sir mast hai apki poem. kya baat hai janab. likha kariye.

राजीव रंजन प्रसाद said...

राकेश जी..

एसा गीत जिसे बरबस ही गुनगुनाने को जी करे।उस पर एसे बिम्ब की मन हरा हो गया:

अषाढ़ी एक बदली को गली के मोड़ पर देखा
गईं फिर दौड़ पकड़ी बाँह उसकी पास में जाकर

तुम्हारा चित्र देखा एक दिन पुरबाई के घर में
तभी से हर गली हर मोड़ पर तुमको पुकारा है

मचल कर सरगमों की रागिनी से ज़िद किये जाती
कहाँ से तान पाई है जरा ये भेद तो खोलो

*** राजीव रंजन प्रसाद

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर बिम्बों से सज्जित भावपूर्ण रचना है राकेश जी, हमेशा की तरह.

शीर्षक देख कर लगा कि आप छेडछाड करने जा रहे हैं परन्तु माजरा कुछ और ही था.

sunita (shanoo) said...

राकेश जी बेहद सुंदर मनमोहक गीत है...
तुम्हारे कुन्तलों को छेड़ने की चाहतें लेकर
हवाओं ने घटाओं से पता पूछा तुम्हारा है
हर पक्तिं अपने आप में पूर्ण मालूम पड़ती है मगर फ़िर भी एक साथ जुड़ी हुई है...
बुलाया चाँदनी को नाम ले लेकर तुम्हारा ही
सुरभि से पूछती हर बार उद्गम है कहाँ बोलो
मचल कर सरगमों की रागिनी से ज़िद किये जाती
कहाँ से तान पाई है जरा ये भेद तो खोलो...

सुरभि की, चाँदनी की, रागिनी की स्रोत तुम ही हो
तभी बन याचिका इनको उमंगों से निहारा है

अद्भुत गीत जो हर कोई गुनगुनाना चाहेगा...
बहुत-बहुत बधाई...और अगले गीत का बेसब्री से इन्तजार रहेगा...

सुनीता(शानू)

Udan Tashtari said...

बुलाया चाँदनी को नाम ले लेकर तुम्हारा ही
सुरभि से पूछती हर बार उद्गम है कहाँ बोलो
मचल कर सरगमों की रागिनी से ज़िद किये जाती
कहाँ से तान पाई है जरा ये भेद तो खोलो

सुरभि की, चाँदनी की, रागिनी की स्रोत तुम ही हो
तभी बन याचिका इनको उमंगों से निहारा है

---अद्भुत गीत-पढ़ते पढ़ते स्वर झंकृत हो उठे और अनायास ही गुनगुनाने को जी चाहता है. वाह!! बहुत खूब. बधाई.

अभिनव said...

वाह भाईसाहब वाह, बहुत सुंदर गीत।
अब लगता है सोनू निगम जी से बात करनी पड़ेगी कि आपके गीतों का एक गुलदस्ता तैयार किया जाए। अद्भुत हैं।

Kavi Kulwant said...

राकेश जी! बहुत खूब लिखा है! मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें .. कवि कुलवंत

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