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Showing posts from November, 2015

पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं

तुम तो बसी हुई सांसों में सहचर हो धड़कन की मेरी
शतरूपे फ़िर सपनों की पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं
एक प्रतीक्षा पलक बिछाये रहती है लम्बी राहों पर चरण पुष्प की खिली पांखुरी हौले से आकर के छू लेकनक तुली काया से झरते गन्धों के झरने में भीगेमादकता से ओत प्रोत झोंकों में लेते पैंगे झूले
गिरती हुई ओस सी पग की आहट के मद्दम सुर लेकरराग तुम्हारा मिले तभी फिर गीत बना कर गाऊँ मैं
नभ में उड़ते पाखी लाते सन्देसे केवक वे ही जोपाकर  के आभास तुम्हारा अनायास ही संवर गये हैंमेघदूत कलसी में भरकर ढुलकाता है सुधा कणों कोजोकि तुम्हारे कुन्तल की अलगनियों पर से बिखर गये हैं
तन की द्युतियाँ, मन की गतियाँ बन्दी होकर रहीं तुम्हारीकलासाधिके , पृष्ठ खोल दो तो संभव पढ़ पाऊँ मैं
करवट लेकर आंख खोलती प्राची  के आंगन में किरणेंऔर पखारें अपने मुख को ढलती हुई ज्योत्सनाओं मेंउगता हैं तब चित्र तुम्हारा बिछे क्षितिज के कैनवास परसाँझ  आँजने लग जाती हैं , तब से मीत तुम्हारे सपने
इन्द्रधनुष के रंग तुम्हारे  इक  इंगित के अनुयायी है बंधी हथेली तनिक खुले   तो चित्र कोई रंग पाऊँ  मैं

जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी

नव ग्रहों ने किया आज गठजोड़ यूँ सब के सब आज नौ  वर्ष में ढल गए इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजी उसमें आकर सभी एक संग  मिल  गए
फिर से इतिहास के पृष्ठ कुछ खुल गए याद में सात रंगी उमंगें घिरी फिर से जीवंत होने लगे वे निमिष जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी दृष्टी की रश्मियाँ थी रिसी ओट सेपार करते हुए कुछ अवनिकाओं को तंत्रियों में बजी सरगमों की धुनें साज करते हुए मन की धाराओं को
वह घड़ी जब हृदय से हृदय के सिरे बिन प्रयासों के सहसा गले मिल गए इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए
एक वह मोड़ जिस पर भटकती हुई वीथियां दो अचानक निकट आ गई एक वह पल कि जिसमें समाहित हुई प्रेम गाथाएं खुद को थी दुहरा गई जो शची से पुरंदर का नाता रहा उर्वशी से पुरू का था सम्बन्ध जो एक पल में नया रूप धरते हुए सामने आ खड़ा अवतरित हो के वो 
झोंके बहती हवा के लिए गंध को तन को मन को भिगोने को ज्यों तुल  गए इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए
अग्नि के साक्ष्य में जो हुए थे ध्वनित मन्त्र के स्वर लगे आज फिर गूंजने शिल्प का एक, श्रृंगार आकर किया रूप की चमचमाती हुई धूप  ने …

खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुये गन्ध के राही

पंक्ति बना कर शब्द अनगिनत होठों पर आ बस तो जातेमन ये माने नहीं गीत हैं, सुर चाहे सज कर गाते हैं
सन्ध्या आ लिखने लगती है बीते दिन के इतिहासों कोदीप हजारों जल जाते हैं अर्जित पीड़ा की बाती केअवरोघों के अवगुंठन में उलझ आह के सिसकी के सुरसन्नाटे की प्रतिध्वनियों के रह जाते हैं साथी बन केसीढ़ी पर धर पांव उतरती रजनी के पग की आहट पासोई हुई पीर के पाखी फ़िर से पंख फ़ड़फ़ड़ाते हैंफ़ैली हुई हथेली असफ़ल रह जाती कुछ संचय कर लेखुलती नहीं दृष्टि द्वारे पर लटकी आगल और साँकलेंअभिलाषा के वातायन पर जड़ी हुईं अनगिनत सलाखेंकर देती हैं पूर्ण असंभव नील गगन में जरा झाँक लें
खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुए गंध के राहीकभी कभी तो जानबूझ कर अपनी गठरी खो जाते हैं
गीला करता आंजुरि को आ जब जब नव संकल्पों का जलतब तब विधना की कलमों से रच जाते हैं नूतन अक्षरआशाओं के चन्द्रमहल सब, सिन्धु तीर पर बालू वालेएक घरोंदे जैसे पाकर परस लहर का रहे बिखर  कर
उलझी हुई हाथ की रेखाओं से नक्षत्रों के रिश्तेजोड़ घटाने, भाग गुणित करने पर सुलझ नहीं पाते हैं

दीप दीपावली के सजें न सजें

दीप दीपावली के सजें न सजेंये अंधेरे नहीं शेष रह पायेंगेतुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पलदीप अँगनाई में खुद ही जल जायेंगे
भोर नित ही उगाती रही सूर्य कोसांझ ढलते अंधेरा मगर आ घिरेअनवरत चल रहे चक्र के आज तककोई भी थाम पाया नहीं है सिरेआओ अब इक नई रीत को जन्म देंफ़िर न रह पाये मावस अंधेरी यहाँमुस्कुराती रहे चाँदनी से सजीदोपहर सी गली हो सजे नित जहाँ
नागिनी नृत्य से ये निशा के चिकुरचाँद की रश्मियाँ बन सँवर जायेंगेतुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पलदीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे
रोशनी की किरन एक पल न थकीतम की सत्ताओं से युद्ध करते हुयेतम कुचलता हुआ सिर उठाता रहाआदि से आज तक यूँ ही चलते हुयेआज रच लें नई नीतियां कर जतन जो अंधेरे का बाकी नहीं शेष होएक क्षण के लिये भी नहीं रुक सकेशंख से  गूँजकर अब जो जयघोष हो
ये तुम्हारे ही इंगित से संभव प्रियेपृष्ठ इतिहास के सब बदल जायेंगेतुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पलदीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे
कार्तिकी एक तिथि की प्रतीक्षा बिनादीप के पर्व हर रोज मनता रहेभोर दीपक जलाये जो कल आ यहाँकाल के अंत तक यूँ ही जलता रहेशब्दकोशों से मिट कर तिमिर अब रहेआओ ऐसे प्रयासों को मि…

इक गीत नया होने को है

अलसाई सांझ ओढ़ लेती इन दिनों नया ही इक घूँघटझरते पत्तों में धीमे से बोता रागिनियाँ वंशीवटअभिसारित अभिलाषायें ले कह उठता है शरदीला पलये रात कहाँ सोने को हैइक गीत कोई होने को है.
आता है दूर कहीं गिरती बर्फीली फुहियों का ये  सुर सीढ़ी से नीचे उतर रही, पुरबाई के पग के नूपुर इनको लेकर के साथ चला आवारा मौसम का पटुवा सरगम लगता पोने को है इक गीत नया होने को है 
दिन सिकुड़ा सकुचा सिमटा सा ,निशि यौवन की ले अंगड़ाई शिंजिनियाँ घोल शिरा में दे, भुजपाशों की ये गरमाई पुष्पित शर लिए खड़ा धन्वा , इक  लक्ष्य भेद संधाने है अब ध्यान भंग होने को है इक गीत नया होने को है 
चंदियाई गोटे का जोड़ा, पहने रजनी की नवल वधूहाथों की मेहँदी के बूटे, महकाते संदलिया खुशबूनजरें उठ्ती हैं बार बार वापिस आती हैं पथ को छूआतुर अपने गौने को है------------------फ़िर कलम किस तरह मौन रहेइक नया गीत होने को है.