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Showing posts from February, 2015

बस सन्नाटे की प्रतिमायें

क्रुद्ध हुई तूलिका न भरती भावों में अब रंग तनिक भी शब्दों के सांचे में ढलतीं, बस सन्नाटे की प्रतिमायें खामोशी की बाढ़ उमड़ कर घेर खड़ी है गांव दिवस का रात तनी है फ़ौलादी दीवारों जैसे कट न पाती धुन्ध घिरी आंचल फ़ैला तारों के दीप बुझा देती है और प्रतीची निगल रोशनी, मौन खड़ी होकर मुस्काती झंझावात उठे अनगिनती, कभी इधर से कभी उधर से किन्तु सुई के गिरने तक सा शोर न करती घिरी घटायें थक सो जाते प्रहर ओढ़ कर आरोपों की काली चादर झुकी कमर ले प्रश्नचिन्ह भी तनकर खड़ा नहीं हो पाता वाणी की कमन्द अधरों के कंगूरे पर नहीं अटकती उठता नहीं कंठ की घाटी से स्वर फ़िसल फ़िसल रह जाता मंचासीन भावनायें हो सम्बोधित कर लें संभव है उत्सुक होकर ताक रही हैं साथ अपेक्षा के आशायें दीवारों पर लटकी घड़ियों और कलेंडर में अनबन है एक चले दक्षिण तो दूजा पश्चिम की राहें तलाशता कभी समन्वय की राहों से बंधता नहीं मित्रता का क्षण वृत्त ढूँढता है त्रिकोण के साथ साथ अपनी समानता और दुपहरी आशान्वित है शायद हो अनुकूल समय तो उसके हिस्से में आ जाएँ पूर्ण चन्द्र की चंद विभायें

शब्द के बीज दिन रात बोते रहे

नैन की प्यालियों में भरे ही नहीं
शब्द परछाइयों में समोते रहे ` चंद असमंजसों के निमंत्रण ही थे जो रहे चूमते मेरी दहलीज को व्रत अनुष्ठान हो याकि पूजा कोई पूर्णिमा हो या एकादशी तीज हो जल न संकल्प का अंजुरी में भरा मन के, दुविधा घुमड़तीरही व्योम में और बेचैनियों के उमड़ते हुए चंद ज्वालामुखी बस गए रोम में
बस अनर्थों ने की अर्थ की व्याख्या इसलिए प्रश्न उलझन में खोते रहे
अजनबी चाहतें दूर ही रह गईं पास जो थीं उन्हें जान  पाए नहीं सिन्धु तो भावनाओं के गहरे रहे ज्वार लेकिन कभी आन पाए नहीं सामने जो रहा,वो तो नेपथ्य था पार्श्व में मंच अभिनीत होता रहा ज़िंदगी ने जिसे भूमिका को चुना पत्र वह आंख कर बंद सोता रहा 
स्वर की फसलें नहीं उग सकीं कंठ में शब्द के बीज दिन रात बोते रहे
अधखुली मुट्ठियों से फिसलते हुए हाथ की रेख बिछती रही राह  में  आगतों ने उडी  फूल की गंध को कैद कर रख लिया अपनी ही बांह में  दृष्टि जाकर जहाँ थी क्षितिज पर टिकी बिम्ब बनाते रहे मरुथलों के वहां एक उलझन खडी सामने हर घड़ी हमको जाना कहाँ और हैं हम कहाँ 
आँख को स्वप्न की इक छुअन  मिल सके इसलिए दोपहर साँझ सोते रहे
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शून्य से जोड़ बाकी गुणा भाग में

झाड़ियों में छुपे जुगनुओं की तरह
याद आये दिवस चन्द बीते हुए
भावना के जलद आ उमड़ने लगे
छलछलाते हुए कुछ थे रीते हुये
मन के भीगे हुए पृष्ठ को तूलिका
चित्र करती रही एक रजताभ से
बुर्जियों पे चढ़े दृश्य सहसा लगे
दूर बिलकुल नहीं हैं बहुत पास वे

अजनबी कशमकश में घिरे किन्तु हम
कुछ हवा में लकीरें बनाते रहे
झोलियां अपनी फ़ैली रहीं पए सभी
पल जो पहचानते दूर जाते रहे

दोपहर का दुशाला खड़ा ओढ़कर
दिन ठिठुरता रहा था कड़ी धूप में
रस्सियाँ सांझ की खींच पाई नहीं
जो सितारे गिरे रात के कूप में
भोर के प्रश्न पर चुप दिशायें रहीं
रंग अपना ही सिन्दूर ने पी लिया
नैन की देहरियों से रहा दूर ही
मुस्कुराती हुई यामिनी का पिया

कक्ष की भीत पर एक लटकी घड़ी
की सुई व्यर्थ चक्कर लगाती रही

सरसराती हुई पत्तियों से हवा
बात करती रही ड्यौढ़ियों पर रुके
देखते दूर से थे पखेरू रहे
बादलों की नई पालकी पर चढ़े
झर रही रोशनी भूमि छूते हुए
रँग गई द्वार पर चन्द रांगोलियाँ
आस बैठी रही पर भिखारिन बनी
खोल कर अपनी मैली फ़टी झोलियाँ

एक परछाईं अपना पता पूछने
पल में आती रही,पल में जाती रही

ये सर्दी के दिन

ये सर्दी के दिन 

वस्त्र विहीना शाख पेड़ की थरथर थरथर कांपे  कजरारी इक सड़क दूधिया चादर से तन ढांपे  अड़ियल घोड़े से गाड़ी के पहिये बढे न आगे  पंथ करा साष्टांग दण्डवत  दूरी अपनी नापे 
पूरा दिवस बीतता गिनाते लम्हे और पल छिन   ये सर्दी के दिन 
गर्म चाय की प्याली  कोई आ होंठो को छू ले  मन सामीप्य अलावों वाला इक पल भी न भूले  पश्मीने की शाल बांध कर रख ले भुजपाशों में  बनें रजाई श्वेत रूई के उड़ते हुए बगूले 
पता नहीं कब तक मांगेगा मौसम हमसे ऋण  ये सर्दी के दिन 
थर्मामीटर के तलघर में जाकर बैठा पारा  बीस अंश फहराहाइत से लड़ बेचारा हारा  वातायन के परे गूंजती झंझाओं की पायल  लाल भभूका है गुस्से से हीटर भी बेचारा 
बाहर हवा चूमती मुख को बन कर तीखी पिन  ये सर्दी के दिन 

क्या बताऊँ कौन हूँ मैं

आपका यह प्रश्न मुझसे यह बताऊँ कौन हूँ मैं और मैं ये सोचता हूँ क्या बताऊँ कौन हूँ मैं शब्द हूँ मैं भावनाएं कर रहा है जो प्रकाशित पुष्प हूँ में वाटिकाएं कर रहा है जो सुवासित दीप हूँ संघर्षरत जो हर घड़ी रहता तिमिर  से याकि  हूँ मैं रत्न जो श्रृंगार को करता अलंकृत सोचता हूँ एक दिन यह जान पाऊं कौन हूँ मैं और फिर मैं आपको आकर बताऊँ कौन हूँ मैं रूप को सज्जित करे मैं वह अधर की मुस्कराहट पाँव को नर्तित करे मैं पायलों की झनझनाहट ले रहा अंगडाइयां जो साज में संगीत हूँ मैं याकि हूँ संकल्प को उत्कर्ष की मैं छटपटाहट एक दिन यह भेद सारे खोल पॉऊ कौन हूँ मैं है तभी संभव बताऊँ आपको यह कौन हूँ मैं भोर की पहली किरण हूँ जो दिवस के द्वार खोले सिन्धु हूँ जो द्वार पर आये उसे निज में समो ले हूँ गगन निस्सीम करता कल्पनाएँ जो पराजित याकि हूँ वह बुदबुदाहट जोकि शिशु के होंठ बोले हो सके संभव कभी पा जाऊँ उत्तर कौन हूँ मैं तब सुनिश्चित आपको फिर आ बताऊँ कौन हूँ मैं