बस सन्नाटे की प्रतिमायें

क्रुद्ध हुई तूलिका न भरती भावों में अब रंग तनिक भी
शब्दों के सांचे में ढलतीं, बस सन्नाटे की प्रतिमायें
 
खामोशी की बाढ़ उमड़ कर घेर खड़ी है गांव दिवस का
रात तनी है फ़ौलादी दीवारों जैसे कट न पाती
धुन्ध घिरी आंचल फ़ैला तारों के दीप बुझा देती है
और प्रतीची निगल रोशनी, मौन खड़ी होकर मुस्काती
 
झंझावात उठे अनगिनती, कभी इधर से कभी उधर से
किन्तु सुई के गिरने तक सा शोर न करती घिरी घटायें
 
थक सो जाते प्रहर ओढ़ कर आरोपों की काली चादर
झुकी कमर ले प्रश्नचिन्ह भी तनकर खड़ा नहीं हो पाता
वाणी की कमन्द अधरों के कंगूरे पर नहीं अटकती
उठता नहीं कंठ की घाटी से स्वर फ़िसल फ़िसल रह जाता
 
मंचासीन भावनायें हो सम्बोधित कर लें संभव है
उत्सुक होकर ताक रही हैं साथ अपेक्षा के आशायें
 
दीवारों पर लटकी घड़ियों और कलेंडर में अनबन है
एक चले दक्षिण तो दूजा पश्चिम की राहें तलाशता
कभी समन्वय की राहों से बंधता नहीं मित्रता का क्षण
वृत्त ढूँढता है त्रिकोण के साथ साथ अपनी समानता
 
और दुपहरी आशान्वित है शायद हो अनुकूल समय तो
उसके हिस्से में आ जाएँ पूर्ण चन्द्र की चंद विभायें
 

1 comment:

शारदा अरोरा said...

हमेशा की तरह अच्छा ....

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...