शब्द के बीज दिन रात बोते रहे

नैन की प्यालियों में भरे ही नहीं
शब्द परछाइयों में समोते रहे
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चंद असमंजसों के निमंत्रण ही थे
जो रहे चूमते मेरी दहलीज को
व्रत अनुष्ठान हो याकि पूजा कोई
पूर्णिमा हो या एकादशी तीज हो
जल न संकल्प का अंजुरी में भरा
मन के, दुविधा घुमड़तीरही व्योम में
और बेचैनियों के उमड़ते हुए
चंद ज्वालामुखी बस गए रोम में

बस अनर्थों ने की अर्थ की व्याख्या
इसलिए प्रश्न उलझन में खोते रहे

अजनबी चाहतें दूर ही रह गईं
पास जो थीं उन्हें जान  पाए नहीं
सिन्धु तो भावनाओं के गहरे रहे
ज्वार लेकिन कभी आन पाए नहीं
सामने जो रहा,वो तो नेपथ्य था
पार्श्व में मंच अभिनीत होता रहा
ज़िंदगी ने जिसे भूमिका को चुना
पत्र वह आंख कर बंद सोता रहा 

स्वर की फसलें नहीं उग सकीं कंठ में
शब्द के बीज दिन रात बोते रहे

अधखुली मुट्ठियों से फिसलते हुए
हाथ की रेख बिछती रही राह  में 
आगतों ने उडी  फूल की गंध को
कैद कर रख लिया अपनी ही बांह में 
दृष्टि जाकर जहाँ थी क्षितिज पर टिकी
बिम्ब बनाते रहे मरुथलों के वहां
एक उलझन खडी सामने हर घड़ी
हमको जाना कहाँ और हैं हम कहाँ 

आँख को स्वप्न की इक छुअन  मिल सके
इसलिए दोपहर साँझ सोते रहे 

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