कौन मन के दर्पण में

 
आज कौन मन के दर्पण में इस अंधियारी सर्द निशा में
भित्तिचित्र सी बना रहा है आ आड़ी तिरछी रेखायें
 
कौन संदली सी फ़ुहार से आकर मुझको लगा भिगोने
खिड़की पर पहले बादल सा लेकर सपनों के मृदु छौने
कौन हवा से सरगोशी सी करता आकर ठहर गया है
और कौन शहदीली धुन में अकस्मात ही बिखर गया है
 
मन के प्रश्न सहज महसूसा करते तो है अपना उत्तर
लेकिन फिर भी बाट जोहते उत्तर आ खुद को समझायें
 
तारों की मद्दिम छाया में कितने प्रश्न नींद से जागे
कहो ? कौन मन के दर्पण में जोड़ रहा परिचय के धागे
कौन बो रहा बीज चित्र के आकर नयनों की क्यारी में
कौन महकता है वृन्दावन सा इस मन की फुलवारी में
 
ऊहापोह और असमंजस के आकर घिर रहे कुहासे
ऐसा ना हो उसे चीन्हने में हम कुछ त्रुटियाँ कर जायें
 
उगा कौन मन के दर्पण में, बन चैती का सुखद सवेरा
किसके नयनों की परछाईं, जहाँ लगा रजनी का डेरा
कौन धड़कनों की रागिनियॊं पर आ मुहरें लगा रहा है
कौन साँस की सरगम मे इक सारंगी सी बजा रहा है
 
चाहत मन की आँख बिछाये, उसका परिचय मिल जाये तो
हम भी अपना खोया परिचय बिन बाधाओं के पा जायें
 

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कोई तो है जो जीवन अन्दर से उकेर रहा है।

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