Posts

Showing posts from February, 2013

तपस्या एक भी अब तक सुहागन

आईने अपने लिए हर बार नव  आकार मांग और मन यह आईने से नित नया उपकार मांगे हो नहीं पाई तपस्या एक भी अब तक सुहागनआस्था से कामना का हो नहीं पाया विभाजनकल्पना की दूरियों का संकुचित विस्तार पायारह गई अभिशप्त होकर आस की दुल्हन अभागनधड़कनें नित सांस से अपने लिये उपहार माँगेचाह अपनी तोड़ कर सीमाओं को विस्तार मांगेझर चुके हैं पात, बैठा शाख पर पाखी अकेलाताकता धुंधले क्षितिज पर बिम्ब का बिखरा झमेला शुष्क आहत चिह्न  पर उगते विलापों के स्वरों मेंढूँढ़ता है सांत्वना  को दे सके वह एक हेलामौसमों की बदलियों से पीर का उपचार माँगेसांस अपनी मेहनतों का नित्य ही प्रतिकार मांगेलौट आये उद्गमों पर वृत्त में चलते हुये पगफडफडा कर पंख अपने रह गया मन का अथक खग झाँक कर देखा क्षितिज के अनगिनत वातायनों में घुल गईं सारी अपेक्षा ह दृश्य दीखे कोई जगमगघुंघरुओं का मौन फिर अपने लिए झंकार मांगे कारणों से पीर अपने वास्ते निस्तार मांगे

--

रह गए थे हम जबाब भोर सांझ बेचते

दीपकों से दीप की शिखायें मोड़ मुंह गईंइस तरह से रश्मियां तिमिर की आन छू गईंव्योम में रुकी रही थी खिलखिला के  चांदनीतारकों की पंथ में हुई तमाम रहजनीदिशाओं के भरे कलश सजे थे जितने रीत करझनझनाते रह गये थे पनघटोम की भीत परसीढ़ियों के ही तले से राह नित्य चल पडीमुंह छुपाये रह गयी थी हाथ में बंधी घड़ीबंद पुस्तकों के पृष्ठ खोल रोज देखतेअबूझे प्रश्न के जवाब शून्य में ही खोजतेउम्र बर्फ के डेल  सी घुल गई हवाओं मेंरश्मियों को रह गए हैं  कांच में ही देखतेखिड़्कियों पे जा टिकी रही थी दृष्टि अनमनीपाहुनों की पंथ से सुलझ न पाई अनबनीजाल यूं बिछा रहा समय का था बहेलियारह गईं थी रिक्त फ़िर से फ़ैल कर हथेलियाँद्वार आगतों  के दीप थाल में रखे रहेतीलियां विमुख हुईं थीं अनजले सभी रहेकुमकुमों  ने कुंकुमों के रंग सारे पी लियेले गये विदाई दिन ये बोल के कि जी लियेइक झुकी हुई कमर लिए थे प्रश्न चिह्न जोउत्तरों में अर्थ उनका खोजते थे  भिन्न होमंडियां उजाड़ कोई कुछ नहीं खरीदतारह गए थे हम जबाब भोर सांझ बेचतेयामिनी ने जो लिखे थे पत्र नाम भोर केसांझ की उदासियों के चक्रव्यूह तोड़ केतारकों के अंश को पिरो पिरो के शब्द मेंनभ सरित क…

तुमसे कितना प्यार मुझे है

कुछ प्रश्नों  का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है ऐसा ही यह प्रश्न तुम्हारा तुमसे कितना प्यार मुझे है संभव कहाँ शब्द में बांधू  गहराई मैं मीत प्यार की प्याले में कर सकूं कैद मैं गति गंगा की तीव्र धार की आदि अंत से परे रहा जो अविरल है अविराम निरंतर मुट्ठी में क्या सिमटेगी  विस्तृतता तुमसे मेरे प्यार  की असफल सभी चेष्टा मेरी कितना भी चाहा हो वर्णित लेकिन हुआ नहीं परिभाषित तुमसे कितना प्यार मुझे है अर्थ प्यार का शब्द तुम्हें भी ज्ञात नहीं बतला सकते हैंमन के बंधन जो गहरे हैं, होंठ कभी क्या गा सकते हैं ढाई  अक्षर कहाँ कबीरा, बतलासकी दीवानी मीरा यह अंतस की बोल प्रकाशन पूरा कैसे पा सकते हैं श्रमिक-स्वेद कण के नाते को  रेख सिंदूरी से सुहाग का जितना होता प्यार जान लो तुमसे उतना प्यार मुझे है ग्रंथों ने अनगिनत कथाएं रचीं और हर बार बखानी नल दमयंती, लैला मजनू, बाजीराव और मस्तानी लेकिन अक्षम रहा बताये प्यार पैठता कितना गहरे जितना भी डूबे उतना ही गहरा हो जाता है पानी शायद एक तुम्हों हो जो यह सत्य मुझे बतला सकता है तुम ही तो अनुभूत कर रहे तुमसे कितना प्यार मुझे है।

प्रतीक्षा कर रहा हूँ

फिर तुम्हारे पांव चूमें पनघटों के पंथ को जामैं कलश के रिक्त होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँचाहती है दृष्टि जाकर के रुके उस ईंडुरी परजो तुम्हारे शीश पर की ओढ़नी को चूमती हैऔर वेणी जो लपेटे पुष्पहारों की कतारेंपंथ पर चलते हुये कटि पर निरंतर झूमती हैपायलों की रुनझुनों में कंगनों की खनखनाहटसरगमी सम्मिश्रणों की मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ चाहना है गर्व जितना गागरी को शीष चढ़करहो जरा उतना तुम्हारा स्पर्श पा भुजपाश को भीगंधसिक्ता कलसियों की रसभरी अनुभूतियों काअंश थोड़ा सा मिले जो आतुरा है सांस को भीफिर तुम्हारी कनखियों के कोण दर्पण से विमुख होंपूर्ण मैं श्रंगार होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँदेह की गोदावरी में उठ रहीं चंचल तरंगेंउंगलियों के पोर को कर तीर जिस पल छेड़ती हैंतब हवा की धारियों में हो रही आलोड़ना मेंसावनी मल्हार सरगम के नये स्वर टेरती हैं चंग की इक थाप पर फ़गुनाहटों को मैं सजाकरअब चिकुर के मेघ बनने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ

खबरें वही पुरानी

खबरें वही पुरानी लेकर आया है अखबारसभी जानते किन्तु न करता कोई भी स्वीकारवोही किस्सा भारत में सब करें चापलूसीझूठी करें प्रशंसा बरतें तनिक न कंजूसीलेकर एक कटोरा माँगें द्वारे द्वारे"वाह"देख दूसरों की करते हैं अपने मेन में डाहखुद ही अपनी पीठ ठोकते आये हैं हर बार वही पुरानी लेकर आया है अखबार चार बटोरे अक्षर कहते हैं खुद को ज्ञानीकहते वेद रचयिता हैं वो इतने अभिमानीखुद का लिखा खुदा न समझे,पथ के अनुयायीबिखराते हर एक क्षेत्र में ये केवल स्याहीदेख दुराग्रह इनका सारे तर्क गये हैं हारखबरें वही पुरानी लेकर आया है अखबारअपना खेमा अपना भौंपू ये लेकर चलतेकोई आगे बढ़े तनिक तो तन मन हैं जलतेसारे ग्रन्थ होंठ पर इनके आकर हैं रुकतेये खजूर के पेड़ सरीखे नहीं जरा झुकतेदंभ सदा ही रहता आया सिर पर हुआ सवार खबरें वही पुरानी लेकर आया है अखबार