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Showing posts from July, 2011

अब चुप होकर मैं

थमे हवा के झोंके छत के कमरे में बैठेलहरें छुपीं रहीं जाकर पर्वत के कोटर मेंतारों पर झंकार नींद से होड़ लगा सोईसोच रहा हूँ बैठूं थोड़ा अब चुप होकर मैं

पीपल बरगद चन्दन पानीलहराते निर्झरयज्ञभूमि वेदी आहुतियाँसंकल्पों के स्वरनिष्ठा और आस्था संस्कृतियों की गाथाएँमन्त्रों मेम गुन्थित जीवन कीसब परिभाषाएंलिखते लिखते बिखर गई है चादर पर स्याहीजिसे उठा कर सोच रहा हूँ,रख दूं धोकर मैंसपनों के अनुबन्ध औरसौगन्धें अयनों कीरतनारे,कजरारे,मदमयगाथा नयनों कीगठबन्धन,सिन्दूर,मुद्रिकापैंजनिया कंगनचौथ,पंचमी,पूनम,ग्यारसअविरल आयोजनदोहराते बीते जीवन की निधि का रीतापनसोच रहा हूँ चलूँ और अब कितना ढोकर मैंखुले अधर के मध्य रह गईंबिना कहे बातेंमौसम साथ न जिनको लायावे सन सौगातेंक्यारी,फूल,पत्तियाँ,काँटेभंवरों का गुंजनअलगोजे की तान-अधूरीपायल की रुनझनसब सहेज लेता अनचाहे यायावरी समयसोच रहा क्या पाऊंगा,फ़िर से यह बोकर मैं

जो छिपे हैं हुये नाम के नाम में

रूढ़ियों से बँधी सोच को दे रहासोच के कुछ नये आज आयाम मैंचेतना में नये बोध के बीज लेबो रहा हूँ नई भोर में शाम मेंजो डगर ने सजा चिह्न पथ में रखेमैने उनका किया है नहीं अनुसरणमैने खोजीं सदा ही दिशायें नईमंज़िलों के पथों की नई व्याकरणबादलों की बना तूलिका खींचताचित्र मैं कैनवस इस गगन को बनालीक को छोड़कर साथ मेरे चलेमैं हवा को सिखाता नया आचरणनाम विश्लेष कर ढूँढ़ता अर्थ वेजो छिपे हैं हुये नाम के नाम मेंमैने कागज़ उठा ताक पर रख दियेगीत लिखता हूँ मैं काल के भाल परसांस की सरगमें नृत्य करती सदामेरी धड़कन की छेड़ी हुई ताल पररात मसि बन रही लेखनी पर मेरीरंह भरता दिवाकर मेरे शब्द मेंछन्द शिल्पित करे अन्तरों को मेरेचित्र खींचे अनागत स्वयं अक्ष मेंमैं सजाने लगूँ जब भी पाथेय तबआके गंतव्य बिछता रहा पांव मेंदीप बन कर लड़ा मैं तिमिर से स्वयंचाँदनी के भरोसे रहा हूँ नहींतीर होते विलय धार में जा जहाँमैं उम्नड़ कर बहा हूँ सदा ही वहींजो सितारे गगन से फ़िसल गिर पड़ेटाँकता हूँ क्षितिज के नये पृष्ठ परनैन की पार सीमाओं के जो रहामैं उसे खींच ला रख रहा दृष्टि परछाप अपनी सदा मैं रहा छोड़तापल,निमिष ,क्षण, घड़ी और हर याम में

महकाता मन का वृन्न्दावन

धड़कन धड़कन सां सांस सब मेरी तुमसे जुड़ी हुई हैंदिवस निशा के हर इक पल पर सिर्फ़ तुम्हारा ही है शासनकाजल की कजराई में जब डूबे कलम कल्पनावालीहस्ताक्षर उस घड़ी उर्वशी के घुल जाते मुस्कानों मेंअलकों में आ गुँथ जाते हैं मेघदूत वाले सन्देशेवाणी की सरगम बनती है वंसी से उठती तानों मेंगंगा यमुना कावेरी की लहरों में तुम लो अँगड़ाईकलासाधिके तुम करती हो चित्रित मेरे मन का आंगनयुग के महाकाव्य अनगिनती अंकित आकाशी अक्षों मेंदृष्टि किरण से अनुबन्धित हो सृष्टि प्रलय पलकों में बन्दी चितवन में अंकित सम्मोहन के सब मंत्र मेनका वालेसांसों के इक सुरभि परस से मलयवनों को मिले सुगन्धीशतरूपे तुम परे सदा ही भाषाओं की सीमाओं सेएक निमिष ही ध्यान तुम्हारा महकाता मन का वृन्दावनशिल्पकार की छैनी हो या कलाकार की कूची कोईउनका वेग नियंत्रित करता है बस एक तुम्हारा इंगितताजमहल की मीनारें हों या कि अजन्ता की दीवारेंसब के सब होते आये हैं एक तुम्ही को सदा समर्पिततुम फागुन की मस्त उमंगों में लहराती चूनरिया होऔर तुम्ही तो हो मल्हारें जिनको नित गाता है सावन

कोई वह गीत गाये तो

सुरभि की इक नई दुल्हन चली जब वाटिकाओं सेतुम्हारा नाम लेने लग गये पुरबाई के झोंकेमहकती क्यारियों की देहरी पर हो खड़ी कलियाँनिहारी उंगलियों को दांत में रख कर,चकित होकेउठे नव प्रश्न शाखों के कोई परिचय बताये तोलिखा जो गीत स्वागत के लिये, आकर सुनाये तोखिलीं सतरंगिया आभायें पंखुर से गले मिलकरगमकने लग गई दिन में अचानक रात की रानीकभी आधी निशा में जो सुनाता था रहा बेलालचकती दूब ने आतुर सुनाने की वही ठानीखड़कते पात पीपल के हुये तैयार तब तनकरबजेंगे थाप तबले की बने, कोई बजाये तोलगीं उच्छल तरंगें देव सरिता की डगर धोनेजलद की पालकी भेजी दिशाओं ने पुलक भर करसँवर कर स्वस्ति चिह्नों ने सजाये द्वार के तोरणलगीं शहनाईयां भी छेड़ने शहनाईयों के स्वरमलय के वृक्ष ने भेजे सजा कर लेप थाली मेंसुहागा स्वर्ण में मिल ले, जरा उसको लगाये तोबिखेरे आप ही लाकर, नये, दहलीज ने अक्षतसजाईं खूब वन्दनवार लाकर के अशोकों नेप्रतीक्षा में हुई उजली गली की धूप मैली सीसजाये नैन कौतूहल भरे लेकर झरोखों नेमचलती बिजलियों की ले थिरक फिर रश्मियाँ बोलींहजारों चाँद चमकेंगें, जरा घूँघट हटाये तो..