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Showing posts from February, 2009

मेरा और तुम्हारा परिचय

चाहा तुम्हें लिखूं तुम हो नभ का विस्तार सितारा हूँ मैं
चाहा कहूँ तुम्हें सागर-जल का भंडार किनारा हूँ मैं
चाहा तुमको लिखदूं तुम निस्सीम, दायरे में मैं बन्दी
लिखूँ अक्षुण्य निरन्तर तुमको हो हरबार, दुबारा हूँ मैं

लिखने लगी कलम लिख डाला तुम तुम ही हो, तुम ही हो मैं
तुम्हें नहीं परिचय आवश्यक और तुम्ही हो मेरा परिचय

तुमने ही तो कहा समय हो तुम गतिमान, रुके हो पल छिन
तुम ही जड़ हो, तुम ही चेतन, तुम ही निशा और तुम ही दिन
एक अकेले तुम ही नश्वर, तुम ही क्षण तुम ही क्षण्भंगुर
तुम अनादि हो, आदि तुम्ही हो और एक तुम ही गूँजा सुर

ज्ञानदीप की ज्योति तुम्ही हो और तुम्ही हो उपजा संशय
तुम्हें नहीं परिचय आवश्यक और मेरा भी तुम ही परिचय

मैं क्या लिख पाऊंगा तुमको, तुम ही शब्द तुम्ही अक्षर हो
तुम ही एक दानकर्ता हो तुम ही तो याचक का कर हो
तुम ही कालनिशा का तम हो, तुम अंधियारा अज्ञानों का
तुम एकाकी ज्योतिपुंज हो, तुम प्रकाश नव विज्ञानों का

तुम ही तो पल पल पर विचलित, तुम्ही तो हो तन्मय चिन्मय
तुम्हें कहां परिचय आवश्यक , तुम परिचय का भी हो परिचय

उल्का भी तुम, धूमकेतु तुम, तुम अनदेखे श्याम विवर हो
तुम नभ की मंदाकिनियों में प्राण प्रव…

सत्यापित करवाया प्रियतम

निशा तुम्हारेही सपनों को लाती है नित झोली में भर
तथ्य यही आंखों से मैने सत्यापित करवाया प्रियतम

पा कर जिनका स्पर्श सुवासित हो जाती है किरन दूधिया
और रातरानी आंगन में फूल खिलाने लग जाती है
आशाओं के जुगनू के पर आशा से होते चमकीले
और सितारों की छायायें सावन गाने लग जाती हैं

उनकी गलियों से जो आये हर झोंका मलयज का होवे
यह प्रस्ताव गंध से मैने प्रस्तावित कर पाया प्रियतम

भाव ह्रदय के व्यक्त न होकर रह जाते हैं जब अनचीन्हे
सम्बन्धों के पथ में उगते संशय के बदरंग कुहासे
अवगुंठित होने लगते हैं धागे बँधे हुए रिश्तों के
धुँधलाने लगती तस्वीरें, बनी हुई जो चन्द्र विभा से

भाव ह्रदय के तुम तक पहुँचें, इसीलिये शब्दों को मैने
सरगम के रंगों में रँग कर विज्ञापित करवाया प्रियतम

ढलती हुई सांझ ने भेजा जिन सपनों को नेह निमंत्रण
उन्हें यामिनी बिठा पालकी अपने संग में ले आती है
लेकिन ढलती हुई उमर की निंदिया की स्मॄति की मंजूषा
उगती हुई भोर की चुटकी सुन कर खाली हो जाती है

मैं जब देखूँ स्वप्न तुम्हारे, ऊषा पलक नहीं खड़काये
सूरज से कह आज नियम यह प्रतिपादित करवाया प्रियतम

मन की भाषा कह पाने में शब्द सदा हो जाते अक्षम
और शब्द के सोचों से ह…

यही मैं जान पाना चाहता हूँ

कौन से सन्दर्भ की मैं आरती बोलो उतारूँ
कौन सी प्रतिमा पिरोकर शब्द में अपने पुकारूँ
कौन सा झोंका हवा का शब्द में अपने पिरोऊँ
तूलिका में रंग भर कर चित्र मैं किसके संवारूँ

हिचकिचाता नाम कोई चढ़ नहीं पाता अधर पर
नाम किसका है ? यही मैं जान पाना चाहता हूँ

उठ रही है लहर नदिया की किसे छूकर न जाने
लग रही पुरबाईयाँ जा द्वार अब किसका सजाने
देह के किसके परस से पुष्प सुरभित हो रहे हैं
ले रही है छांह किसकी बादलों के संग उड़ानें

एक पल लगता मुझे मैं हूँ नहीं उससे अपरिचित
किन्ब्तु परिचय क्या ? यही पहचान पाना चाहता हूँ

कर रहीं हैं बात किसकी पत्तियाँ ये सरसराती
गीत किसके कोयलें गा, बुलबुलों को सुनाती
है पिरोता कौन ला मुस्कान कलियों के अधर पर
दॄष्टि है किसकी, परस से रात को जो दिन बनाती

है पुराना पॄष्ठ कोई एक बीती डायरी का
कौन सा लेकिन बरस था, भान पाना चाहता हूँ

बन गई है जो गज़ल में प्रीत की सहसा रवानी
लिख गई है भोजपत्रों पर स्वयं जिसकी कहानी
भित्तिचित्रों में ढले जो रंग तो संवरी अजन्ता
नाम जिसका छू सुबासित हो रही है रातरानी

जानता हूँ हर गज़ल में गीत में वह ही समाहित
मैं उसी से गीत का उनवान पाना चाहता हूँ

सुन्दरता की परिभाषायें

सुनो! कहा है जबसे तुमने गीत लिखूं मैं सुन्दरता के
मैं तब ही से ढूँढ़ रहा हूँ सुन्दरता की परिभाषायें

कलियां,फूल,सेमली फ़ाहे या उड़ते बादल का टुकड़ा
परस रेशमी, छुअन भाव की किसको ज्यादा मानूं कोमल
पी के अधर, सुरभि का चुम्बन या पदचाप पवन झोंके की
या फिर गालों को सहलाते उंगली बन कर उड़ते कुन्तल

जितने भी अनुभव हैं उनकी विलग रहीं अनुभूति हमेशा
सोच रहा हूँ इनमें से मैं किसकी शुरू करूँ गाथायें

सुन्दर होता है गुलाब का फूल ! कहा तुमने, माना,पर
क्या सुन्दर है ? पाटल,पुंकेसर या गंध सुरुचिमय लगती
या विन्यास, संयोजन है या रंगभरी कुछ पंखुरियों का
या हैं सुन्दर नयन कि जिनमें है गुलाब की छवि सँवरती

एक शब्द की गहराई में कितने सागर की गहराई
यह मैं समझ सकूँ तो संभव भाव शिल्प में ढलने पायें

इतिहासों ने करवट लेकर कहा नहीं यह संभव होता
रंग और परिधान मात्र ही सुन्दरता के द्योतक हो लें
परे शिल्प के और बहुत है जो शब्दों में सिमट न पाता
और हुआ ये नहीं भेद ये शब्द आठ दस मिल कर खोलें

मन के बन्धन बांधे हैं जो भाव गूढ़ हैं सुमुखि सयानी
क्षमता नहीं स्वरों में इतनी, जो इन भावों को समझायें

दॄश्य, श्रव्य की गंध स्पर्श की सीमायें हैं अपनी अपनी
औ…

एक दिवस वह डरा डरा सा

एक दिवस जब तुम मुझसे थे अनजाने ही दूर हो गये
वह इक दिवस आज भी मेरी आंखों में है भरा भरा सा

वह इक दिवस ज़िन्दगी की पुस्तक का पन्ना फ़टा हुआ सा
जोड़ गुणा के समीकरण में से केवल वह घटा हुआ सा
रंग बिरंगे कनकौओं की आसमान में लगी भीड़ से
एक वही है पड़ा धरा पर बिना डोर के कटा हुआ सा

वह दिन देखा रथ पर चढ़ कर जाती थी अरण्य वैदेही
और दग्ध मन लिये विजेता लंका का था डरा डरा सा

वह दिन जब कुन्ती ने अपना लाड़ बहाया था पानी में
वह दिन हुए अजनबी पासे, जब इक चौसर पहचानी में
वह दिन पांव बढ़े थे आगे, जब खींची सीमा रेखा से
वह दिन बिके भाव जब मन के और बिके केवल हानी में

वह दिन अटका हुआ याद के दरवाजे को पकड़े ऐसे
जैसे एक नीर का कण हो पत्ते पर, पर झरा झरा सा

वह दिन अगर इबारत होता लिखी, सुनिश्चित उसे मिटाता
वह दिन भाव मात्र यदि होता, तो मैं उसे शब्द कर जाता
वह दिन लेकिन एक फूल के साथ रहे कांटे के जैसा
जितना चाहूँ उसे भुलाना उतना सीने में गहराता

वह दिन, एक अकेला पत्ता ज्यों पतझर की अँगनाई में
अटका हुआ शाख पर सबसे विलग हुआ पर हरा हरा सा

यूँ ही

आपकी प्रीत की रंगमय तितलियां, आईं उड़ने लगी मेरी अँगनाई में
चन्द झोंके हवा के मचलते हुए, ढल गये गूँजती एक शहनाई में
सांझ की काजरी चूनरी पे जड़े, आ सितारे कई पूनमी रात के
और फिर घुल गई अरुणिमा भोर की उग रही रात की श्याम परछाईं में

उस पल यादों के पाखी

पनघट के पथ से आवाज़ें देती है पायल मतवाली
जुगनू बरसाने लगती है, उलटी हुई गगन की थाली
कंदीलों से बँध उड़ते हैं आंखों के रतनारे सपने
बिना वज़ह छाने लगती है चेहरे पर रह रह कर लाली

और अधर बिन बात छुये ही पल पल लगे थरथराते हैं
उस पल यादों के पाखी मन अम्बर पर उड़ आ जाते हैं

सन्नाटे का राजमुकुट जब संध्या रख लेती मस्तक पर
अटके रहते कान नहीं जो होती द्वारे पर, दस्तक पर
माँग नहीं सूनी राहों की कोई भी पदरज सँवारती
और चाँदनी रह जाती है दर्पण में खुद को निहारती

एक दीप की कंपित लौ पर अनगिन साये मँडराते हैं
उस पल यादों के पाखी उड़ मन अंबर पर आ जाते हैं

रोशनदानों की झिरियों से झांका करे सितारा कोई
सेज बाँह की नहीं छोड़ती अलसाई अँगड़ाई सोई
खिड़की के पल्ले को पकड़े रहती है बीमार रोशनी
रुठी हुई हवा रहती है होकर गुमसुम और अनमनी

और देवता के घर के भी दरवाजे जब भिड़ जाते हैं
उस पल यादों के पाखी उड़ मन अंबर पर आ जाते हैं

बादल के सायों के झुरमुट बन जाते हैं दीवारों पर
मोटा एक आवरण चढ़ जाता छितराये उजियारों पर
करवट से चादर की दूरी सहसा लम्बी हो जाती है
भागीरथी उमड़ नयनों से आ कपोल को धो जाती है

सिरहाने वाले तकिये में अनगिन सिन्धु समा जाते हैं