यूँ ही

आपकी प्रीत की रंगमय तितलियां, आईं उड़ने लगी मेरी अँगनाई में
चन्द झोंके हवा के मचलते हुए, ढल गये गूँजती एक शहनाई में
सांझ की काजरी चूनरी पे जड़े, आ सितारे कई पूनमी रात के
और फिर घुल गई अरुणिमा भोर की उग रही रात की श्याम परछाईं में

6 comments:

mehek said...

bahut hi sundar

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वसन्त आ गया जी... आप की कविता में भी।

सतपाल ख़याल said...

sundar panktiaN.

पंकज व्यास, रतलाम said...

rakesh ji,
aapki panktiyan pasand ayin. inhen ratlam, jhabua(M.P.) aur dahod(Gujarar)se prakashit Dainik prasaran maen prakashit karane ja raha hoon.

kirpaya, aapka postal address mere mail par send karen, taki aapko prati bheji ja saken.

pankaj vyas
pan_vya@yahoo.co.in

Anonymous said...

अगला गीत कब ??

Anonymous said...

तितलियों के परों पे है राहू लगा
आप ही मर्ज की अब दवा दीजिये
बीस गीत नवम्बर के माह में लिखे
आज भी थोडा जल्दी लिखा कीजिये
:) :)
अगला गीत कब ??

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