ज़िन्दगी के राजपथ पर लिख चुका हूँ

शब्द मैं चुन ला रहा अनुभूतियों की क्यारियों से
तुम इन्हें दो कंठ अपना और धुन में गुनगुनाओ

ज़िन्दगी के राजपथ पर तो लिखे हैं गीत अनगिन
आज मैं बिसरी हुई पगडंडियों पर लिख रहा हूं
जो धरोहर मान अपनी दर्पणों ने रख लिये थे
मैं उन्हीं धुंधले अधूरे बिम्ब जैसा दिख रहा हूँ
केतकी का रूप जो खिलता रहा वीरानियों में
आंजता हूँ मैं उसे लाकर नयन के आंगनों में
खींचता हूँ चित्र मैं अब वे क्षितिज के कैनवस पर
रात की स्याही निगल बैठी जिन्हें थी सावनों में

और ये छू लें अगर मन का कोई कोना तुम्हारा
तो मेरी आवाज़ में तुम आज अपना स्वर मिलाओ


दे रहा आवाज़ मैं उन स्वेद के खोये कणों को
स्याहियां बन कर हलों की खेत पर जो खत लिखे थे
शीश पर पगड़ी बना कर जेठ का सूरज रखा था
सावनी धारायें बन कर देह से फ़िसले गिरे थे
जो किये प्रतिमाओं को जीवन्त थे अपने परस से
बालियों को रंग दे धानी हरे पीले सुनहरे
और छूकर नीम की शीतल घनेरी छांह का जल
झिलमिलाते थे रजत कण बन सभी होकर रुपहरे

चिन्ह उनका कोई भी दिखता नहीं है इस नगर में
तुम बताना राह में चलते अगर पहचान पाऒ

बढ़ रही रफ़्तार, आपाधापियां, शंकायें मन में
छूटता विश्वास का हर छोर रह रह उंगलियों से
डर रहा परछाईं से भी आज हर अस्तित्व लगता
चोंकता है जो हवा की थाप पड़ती खिड़कियों पे
चाह तो है द्वार को आकर सजायें चन्द्रकिरणें
किन्तु आतीं तो तनिक विश्वास हो पाता नहीं है
मन मयूरा था प्रतीक्षित सावनी बादल घिरें आ
और घिरते तो कोई भी गीत गा पाता नहीं है

आऒ मेरे साथ मिल तुम चीर दो संशय घिरे जो
और बन क्र दीप उज्ज्वल रोशनी से जगमगाओ

Comments

दे रहा आवाज़ मैं उन स्वेद के खोये कणों को
स्याहियां बन कर हलों की खेत पर जो खत लिखे थे
शीश पर पगड़ी बना कर जेठ का सूरज रखा था
सावनी धारायें बन कर देह से फ़िसले गिरे थे

लाजवाब!
और ये छू लें अगर मन का कोई कोना तुम्हारा
तो मेरी आवाज़ में तुम आज अपना स्वर मिलाओ

वाह राकेश भाई। पूरी रचना लाजबाव है। तुकबंदी की बीमारी से मजबूर हूँ। पेश है-

स्वर मिलाने के लिए ही मौन होकर मैं खड़ा हूँ।
किसमें है वो सुर मिलाना गीत मुझको भी सुनाओ।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
Shardula said…
वन-वन विटप घन स्पर्श पा हो मुदित मन हैं टेरते,
ये सघन घन, वन के ये योगी माला तेरी फेरते !
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Aapka geet padhte hee yeh likha gaya. Vistaar se comment baad mein doongi, abhi itna hee ki adbhut rachna ki shrinkhala . . .
राकेश जी,बहुत बढिया रचना है।बधाई स्वीकारें।

दे रहा आवाज़ मैं उन स्वेद के खोये कणों को
स्याहियां बन कर हलों की खेत पर जो खत लिखे थे
शीश पर पगड़ी बना कर जेठ का सूरज रखा था
सावनी धारायें बन कर देह से फ़िसले गिरे थे
Shardula said…
"वन-वन विटप घन स्पर्श पा हो मुदित मन हैं टेरते
ये सघन घन, वन के ये योगी माला तेरी फेरते
तेरे गीत नन्हें शिशु बन-बन पंक्तिबद्ध मन में उतरते
तान बन कर ग्राम्य जीवन की मधुर धुन छेड़ते"
---ये छंद आपके विलक्षण गीतों को समर्पित !
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"केतकी का रूप जो खिलता रहा वीरानियों में
आंजता हूँ मैं उसे लाकर नयन के आंगनों में"
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"और ये छू लें अगर मन का कोई कोना तुम्हारा
तो मेरी आवाज़ में तुम आज अपना स्वर मिलाओ"
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"दे रहा आवाज़ मैं उन स्वेद ... होकर रुपहरे"
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"चिन्ह उनका कोई भी ... अगर पहचान पाऒ"
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"चाह तो है द्वार को ... गा पाता नहीं है"
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" आऒ मेरे साथ मिल ...रोशनी से जगमगाओ"
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अद्भुत गीतों की श्रृंखला में एक और मोती!
हर छंद अति सुन्दर, भावों से सिक्त !
GURU JEE SAYS said…
aapke anubhutio ke kyari se laye sabd .........aur bisri pagdandi ke git ka sondha mahak mujhe laga kisi bhartia gramin pristbhumi me rahte hue racha gaya hai ......aapka apni mitti se judaw hi aapki aks hai koi aina kya bya kre aapke chehre ko ...
jab sabd me hi chehre ki chamk dikh rahi ho
सतपाल said…
aapki kalam ko shat-shat naman.
kahaN se DHoonDh ke laate hain aap symbolies aapki har kavita dil ko CHoo jaatee hai..

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