गीत भी हँस पड़े

भाव अभिव्यक्त हों इसलिये शब्द की उंगलियां थाम कर देखिये चल पड़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

प्रार्थना में जुड़े हाथ की उंगलियां पोर पर आरती को सजाती रहीं
वर्तिका की थिरकती हुई ज्योति पर पांव अनुभूतियां थीं टिकाये रहीं
शंख फिर गूँज कर पात्र में ढल गये और प्रक्षाल करने लगे मूर्त्ति का
घंटियों का निमंत्रन बुलाता रहा, मंत्र उठता हुआ वारिधि क्षीर का

शिल्प ने थाम लीं हाथ में छैनियाँ, ताकि वह शिल्प अपना स्वयं ही गढ़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

प्रीत के शब्द को पांखुरी पर लिखे मुस्कुराती रही अधखिली इक कली
गंध की डोर पकड़े हुए वावरा एक भंवरा भटकता रहा था गली
क्यारियों में उगीं चाहतों की नई कोंपलें, पर जरा कुनमुनाती हुई
बाड़ बन कर छिपी झाड़ियों में हिना आप ही हाथ अपने रचाती हुई

कर रही थी भ्रमण वाटिका में हवा, भाल उसके अचानक कई सल पड़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

दॄष्टि के पाटलों पर लगी छेड़ने एक झंकार को स्वप्न की पैंजनी
याद के नूपुरों से लिपटती रही छाँह पीपल की हो कर जरा गुनगुनी
स्नेह की बून्द से सिक्त हो भावना नाम अपने नय रख संवरने लगी
और शैथिल्य के आवरण की जकड़ बन्धनों को स्वयं मुक्त करने लगी

कुमकुमे फूट कर श्याम सी चादरेऒं पर नये रंग होकर अचानक चढ़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

6 comments:

Shar said...

:)

बवाल said...

वाह वाह राकेश जी,
आप लिखें और गीत न हंस पड़ें। क्या ही सुन्दर गीत लिखा सर । अहा !
मंत्र उठता हुआ वारिधि क्षीर का
वाह वाह।

Udan Tashtari said...

क्या बेहतरीन गीत हंस कर सामने आया है:

भाव अभिव्यक्त हों इसलिये शब्द की उंगलियां थाम कर देखिये चल पड़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े


--वाह!! जय हो!

रंजना said...

वाह !!! मन को बाँध लेने वाली अतिसुन्दर भावाभिव्यक्ति....वाह !!!

दिगम्बर नासवा said...

राकेश जी...........मधुर भाव लिए सुन्दर गीत रचना.........हिलोरे लेते हंसते हुवे गीतों को सुन्दर रस में बांधा है आपने. आपके हाथों से सुन्दर काव्य की रचना होती है.......

Shardula said...

"सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े"
"शब्द की उंगलियां थाम", " शंख फिर गूँज कर पात्र में ढल गये",
"शिल्प ने थाम लीं हाथ में छैनियाँ, ताकि वह शिल्प अपना स्वयं ही गढ़े"
"गंध की डोर पकड़े हुए वावरा एक भंवरा भटकता रहा था गली"
"भाल उसके अचानक कई सल पड़े"
"याद के नूपुरों से लिपटती रही"
"भावना नाम अपने नए रख संवरने लगी"
===========
बहुत ही सुन्दर गीत ! बहुत ही सुन्दर !!
"बाड़ बन कर छिपी झाड़ियों में हिना आप ही हाथ अपने रचाती हुई"
जानते हैं इस पंक्ति से किस metaphor की याद आयी? सोचिये सोचिये . . . आप ही ने इस्तेमाल किया था उसे अपनी एक कविता में :)
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यहाँ तक याद नहीं आया, गुरु द्रोण एकलव्य से हार गए :)
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आपने जो बसंत की कविता लिखी थी ना, जिसमें लिखा था "हाथ सरसों के पीले किये खेत ने":)

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