पानी नहीं ठहर पाता है

बोये जाते हैं नयनों में बीज स्वप्न के हर संध्या को
किन्तु निशा के आते आते, माली खुद चुन ले जाता है

पगडंडी के राजपथों से जुड़ते जाने की अभिलाषा
प्रतिपादित करवा देती है सुविधाजनक नई परिभाषा
पनघट की हर सीढ़ी पर जब लगें दिशाओं के ही पहरे
मन मसोस कर रह जाता है रखा कमर पर का घट प्यासा

चौपालों की जलती आंखें सूनापन तकती रहती हैं
वापस आने का आश्वासन भी अब लौट नहीं पाता है

पीपल की हर शाखा चाहे गूलर लगें उसी के ऊपर
सूखा पत्ता राह छोड़ कर नहीं उतरना चाहे भू पर
जड़ का साथ न देता कोई, अगर जरा ऊपर इठता है
सिकुड़ सिमटता है चलती है अगर हवा भी उस को छू कर

अपनी धुन में आगे चढ़ता अक्सर भूल यही करता है
बिसरा देता कटा मूल से ज्यादा देर न टिक पाता है

सपनों के आश्रित रह जाना तो आंखों की है मज़बूरी
रहे बढ़ाते सदा दूब, वॄक्ष निरन्तर अपनी दूरी
सूखी हुई दूब पाकर चिंगारी दावानल बन जाये
तो उसका क्या दोष उमर ही हो जाती वॄक्षों की पूरी

लिखा हुआ है इतिहासों में, और ग्रंथ ने भी समझाया
कच्ची मिट्टी की गागर में पानी नहीं ठहर पाता है

Comments

Udan Tashtari said…
लिखा हुआ है इतिहासिओं में, और ग्रंथ ने भी समझाया
कच्ची मिट्टी की गागर में पानी नहीं ठहर पाता है

-पूरा एक दर्शन है इस रचना में..बड़ी गहराई तक उतरवा देने में सक्षम...बहुत आभार इस गहरी रचना और सोच के लिए.
मैं आदरणीय समीर जी की टिप्पणी से सहमत हूँ कि एक पूरा दर्शन है यह रचना..संग्रहणीय।

***राजीव रंजन प्रसाद
www.sahityashilpi.com
www.rajeevnhpc.blogspot.com
www.kuhukakona.blogspot.com
seema gupta said…
चौपालों की जलती आंखें सूनापन तकती रहती हैं
वापस आने का आश्वासन भी अब लौट नहीं पाता है
" bhut sunder, darshnik"

Regards
सपनों के आश्रित रह जाना तो आंखों की है मज़बूरी
रहे बढ़ाते सदा दूब, वॄक्ष निरन्तर अपनी दूरी

बेहतरीन लगी यह ...
Ghost Buster said…
बेहतरीन रचना है, हमेशा की तरह.
राकेश जी
नेट की समस्या से सबसे बड़ी हानि जो मुझे हुई वो थी आप की रचनाओं को ना पढ़ पाना . मुझे कुछ blogs से हमेशा जीवन की ऊर्जा मिलती है जिनमें आप का ब्लॉग sarvopari है. अद्भुत रचना rachte हैं आप दिल करता है बस मंत्र mugdh हुए पड़ते रहें...
नीरज
नेट की समस्या अभी चल रही है....
रंजना said…
"..पीपल की हर शाखा चाहे गूलर लगें उसी के ऊपर
सूखा पत्त राह छोड़ कर नहीं उतरना चाहे भू पर
जड़ का साथ न देता कोई, अगर जरा ऊपर इठता है
सिकुड़ सिमटता है चलती है अगर हवा भी उस को छू कर

अपनी धुन में आगे चढ़ता अक्सर भूल यही करता है
बिसरा देता कटा मूल से ज्यादा देर न टिक पाता है"....


क्या कहूँ.... बहुत बहुत सुंदर. अद्भुत पंक्तियाँ हैं.....
Dr. Amar Jyoti said…
'कच्ची मिट्टी की गागर में…'
सारगर्भित और उतनी ही सुन्दर।
Shar said…
Guruji,
"कच्ची मिट्टी की गागर में पानी नहीं ठहर पाता है".
Guruji, ek baat: har gagar kabhi na kabhi toh kacchi mitti ki hi hoti hei, phir tap aur satsang mile toh hi jeevan ka bartan pakka hota hei.

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रहे बढ़ाते सदा दूब, वॄक्ष निरन्तर अपनी दूरी
सूखी हुई दूब पाकर चिंगारी दावानल बन जाये

Aur jab koi vriksh jhuk ke doob ko aashish deta rahe , toh woh doob bhi nahin sookhegi, na hi davagni banegi. Aasha hei hum sab apne apne jeevan mein aisa kar payein apni aane wali peedhi ke saath.

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