मेरी पॉडकास्ट : दो गीत


आज सुनिये मेरे दो गीत, मेरी ही अवाज में. यह मेरा पॉडकास्टिंग का प्रयास है, बताईयेगा कैसा लगा?

गीत १



---चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ----




चाहता हूँ आज हर इक शब्द को मैं भूल जाऊँ


चाहता हूँ लेखनी को उंगलियों से दूर कर दूँ /






आज तक मैं इक अजाने पंथ पर चलता रहा हूँ


और हर इक शब्द को सांचा बना ढलता रहा हूँ


आईने का बिम्ब लेकिन आज मुझसे कह गया है


व्यर्थ अब तक मैं स्वयं को आप ही छलता रहा हूँ






सांझ के जिन दर्पणों में रंग लाली ने संवारे


सोचता हूँ आज उनमें रात का मैं रंग भर दूँ






निश्चयों के वॄक्ष उगती भोर के संग संग उगाये


और मरुथल की उमड़ती लहर के घेरे बनाये


ओढ़ कर झंझा खड़े हर इक मरुत का हाथ थामा


मेघ के गर्जन स्वरों में जलतरंगों से बसाये






किन्तु केवल शोर का आभास बन कर रह गया सब


सोचता सब कुछ उठा कर ताक पर मैं आज धर दूँ






कब तलक लिखता रहूँ कठपुतलियों की मैं कहानी


बालपन भूखा, कसकती पीर में सुलगी जवानी


कब तलक उंगली उठाऊँ शासकों के आचरण पर


कब तलक सोचूँ बनेगी एक दिन ये रुत सुहानी






कल्पना के चित्र धुंधले हो गये अब कल्पना में


इसलिये संभव नहीं है स्वप्न को भी कोई घर दूँ












गीत २



---तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम---





आँखों के इतिहासों में पल स्वर्णिम होकर जड़े हुए हैं


जब तुमने अभिलाषाओं को मन में मेरे संवारा प्रियतम






लिखी कथा ढाई अक्षर की जब गुलाब की पंखुड़ियों पर


साक्षी जिसका रहा चन्द्रमा, टँगा नीम की अलगनियों पर


खिड़की के पल्ले को पकड़े, रही ताकती किरण दूधिया


लिखे निशा ने गीत नये जब धड़कन की गीतांजलियों पर






अनुभूति के कैनवास पर बिखरे हैं वे इन्द्रधनुष बन


जिन चित्रों के साथ तुम्हारी चूड़ी ने झंकारा प्रियतम






चन्द्रकलायें उगीं कक्ष की जब एकाकी अँगनाई में


साँसों की सरगम लिपटी जब सुधियों वाली शहनाई में


जहां चराचर हुआ एक, न शेष रहा कुछ तुम या मैं भी


हुई साध की पूर्ण प्रतीक्षा, उगी भोर की अरुणाई में






मन की दीवारों पर वे पल एलोरा के चित्र हो गये


अपनी चितवन से पल भर को तुमने मुझे निहारा प्रियतम






आकुलता के आतुरता के हर क्षण ने विराम था पाया


निगल गया हर एक अंधेरा जब अंधियारे का ही साया


मौसम की उन्मुक्त सिहरनें सिमट गईं थीं भुजपाशों में


अधर सुधा ने जब अधरों पर सावन का संगीत बजाया






एक शिला में शिल्पित होकर अमिट हो गया वह मद्दम स्वर


जिसमें नाम पिरोकर मेरा, तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम






आलिंगन की कलियां मन में फिर से होने लगीं प्रस्फ़ुटित


अधरों पर फिर प्यास जगी है, अधर सुधा से होने सिंचित


दॄष्टि चाहती है वितान पर वे ही चित्र संजीवित हों फिर


जब पलकों की चौखट थामे, दॄष्टि खड़ी रह गई अचम्भित






फिर से वे पल जी लेने की अभिलाषा उमड़ी है मन में


इसीलिये मौसम को मैने, भेजा कर हरकारा प्रियतम









4 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर आपकी इस में सुनना और भी अच्छा लगा राकेश जी ..

शोभा said...

राकेश जी
कविता तो सुंदर है ही आपने उसको पढ़ा भी अच्छा है. बधाई.

Lavanyam - Antarman said...

जिसे पढकर बेहद खुशी हुई थी
उन सुँदर सजीले शब्दोँ को
स्वर भी मिल गया !!
बधाई जी :)
सादर स स्नेह
- लावण्या

Shar said...

Geeton ki aadhi podcast kyon? Ise poora keejiye please. aur kuch tabs banaeeye blog pe jahan aapke podcast aur You-tube videos ke links hon ya icons hon. Alag alag maheene mein jaa ke dhoondhna padta hai abhi toh!
hamein pata hai, aap yeh sujhaav sunte hi kahenge ki mujhe farak nahin padta koi sune, na sune, dekhe na dekhe. Par kavivar hamein toh farak padta hai. Roj search karna padta hai:(
Podcast banate samay background mein koi instrumental music laga ke podcast banaeeye.
Ab aap kahenge guru ko sikha raha hai chela!!

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