आप- दो पहलू
रात ने अपना घूँघट हटाया नहीं, बाँग इक छटपटाती हुई रह गई
आँख कलियों ने खोली नहीं जाग कर, गूँज भंवरों की गाती हुई रह गई
आप मुझसे विमुख एक पल को हुए,यों लगा थम गई सॄष्टि की हर गति
पैंजनी तीर यमुना के खनकी नहीं, बाँसुरी सुर बजाती हुई रह गई
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सांस के पॄष्ठ पर धड़कनों ने लिखी , आप ही से जुड़ी वो कहानी हुई
आप की चूनरी के सिरे से बँधी, रात की चूनरी और धानी हुई
आप पारस हैं ये तो विदित था मुझे, आज विश्वास मेरा हुआ और दॄढ़
आपकी देह की गंध को चूम कर, नीम की पत्तियाँ रातरानी हुई


5 टिप्पणियाँ:
राकेश जी बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना ये पंक्तियाँ कुछ खास हैं बहुत सुन्दर बधाई स्वीकारें...
आप मुझसे विमुख एक पल को हुए,यों लगा थम गई सॄष्टि की हर गति..
आपकी देह की गंध को चूम कर, नीम की पत्तियाँ रातरानी हुई
भाई राकेश जी क्या बात है....क्या शब्द चुने हैं आपने...वाह वाह वाह...कितनी बार भी लिखूं कम ही पड़ेगा...सच मन अन्दर तक तृप्त हो गया.
नीरज
बहुत खूबसूरत! शब्द ही नही है वर्णन करने को कि क्या लिखा जाये...
राकेश जी व परिवार के सभी को २००८ के नव -वर्ष की शुभ कामनाएं -
आपकी कलम से ऐसे ही मोती निख्ररते रहें ...
सादर, स -स्नेह,
लावण्या
आह ! राकेश भाई. ये क्या ज़ुल्म कर रहे हैं आप ? हद है. तृप्त हो गया हूँ पढ़कर.
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