दो कदम जो चले तुम मेरे साथ में

स्वप्न मेरा हर इक हो गया भोर का
दो कदम तुम चले जो मेरे साथ में

ये जो दीवार पर है कलेंडर टँगा
आज भी बस दिवस वो ही दिखला रहा
तुमने मुझसे कहा था कि"मैं प्रीत के
कुछ नये अर्थ तुमको हूँ सिखला रहा"
वह दिवस वह निमिष अब शिलालेख हैं
मेरी सुधियों के रंगीन इतिहास में
मेरी परछाईयों में घुल हर घड़ी
तुम रहो दूर या मेरे भुजपाश में

अब समझने लगा, अर्थ सारे छुपे
और अभिप्राय, हर अनकही बात में

पोर पर उंगलियों के हिना ने लिखा
नाम बस आस के एक अनुराग का
रंग उसमें उतरता गया आप ही
गुनगुनाती उमंगों भरे फाग का
कंगनों में जड़े, मोतियों में पिरो
शब्द संबंध के एक अनुबन्ध के
सांस की क्यारियों में लगीं रोपने
धड़कनें, बीज शत-जन्म-सौगन्ध के

बनके दुल्हन लगी झूमने इक दिशा
रंग सिन्दूर के भर गये साध में

प्राप्ति से भर लबालब छलकने लगी
चाहना की बढ़ाई हुई आंजुरी
कामना बून्द की थी, मिली प्रीत से
बादलों के भरे कोष की गागरी
दूरियाँ गीत गाने मिलन के लगीं
अपने अस्तित्व की आहुति होम कर
दॄष्टि के कक्ष में बन्द होकर मिलन
जगमगाया सितारा बना व्योम पर

आज अँगनाई भी लग पड़ी झूमने
गंध पीकर छुपी संदली गात में.

Comments

Rekhaa sreenivasan said…
प्राप्ति से भर लबालब छलकने लगी
चाहना की बढ़ाई हुई आंजुरी
कामना बून्द की थी, मिली प्रीत से
बादलों के भरे कोष की गागरी

ab isake baare meM kuCh kah paanaa asambhav hai
ये जो दीवार पर है कलेंडर टँगा
आज भी बस दिवस वो ही दिखला रहा
तुमने मुझसे कहा था कि"मैं प्रीत के
कुछ नये अर्थ तुमको हूँ सिखला रहा"

पुरानी यादों को सहेजने का अच्छा प्रयास है। सुन्दर रचना है।लिखते रहें।
ये जो दीवार पर है कलेंडर टँगा
आज भी बस दिवस वो ही दिखला रहा
तुमने मुझसे कहा था कि"मैं प्रीत के
कुछ नये अर्थ तुमको हूँ सिखला रहा
वह दिवस वह निमिष अब शिलालेख हैं

पोर पर उंगलियों के हिना ने लिखा
नाम बस आस के एक अनुराग का
रंग उसमें उतरता गया आप ही
गुनगुनाती उमंगों भरे फाग का
कामना बून्द की थी, मिली प्रीत से
बादलों के भरे कोष की गागरी

सुन्दर भाव भरी रचना
कलेंडर को शिलालेख का प्रतीक बनाना बहुत अच्छा लगा
मन के कोमल एहसास की सुन्दर अभिव्यक्ति
कामना पूर्णता का आन्नद
sunita (shanoo) said…
राकेश जी आपके लेखन का कोई सानी नही,..इतना
गहरा लिखतें है की रह शब्द दिल तक दस्तक दे जाता है,..जैसे कि या्दों को संजोये हुए...

ये जो दीवार पर है कलेंडर टँगा
आज भी बस दिवस वो ही दिखला रहा
तुमने मुझसे कहा था कि"मैं प्रीत के
कुछ नये अर्थ तुमको हूँ सिखला रहा"
वह दिवस वह निमिष अब शिलालेख हैं
मेरी सुधियों के रंगीन इतिहास में
मेरी परछाईयों में घुल हर घड़ी
तुम रहो दूर या मेरे भुजपाश में

और कितनी खूब सुरती से समेटा है आपने प्यार का ये रंग...

पोर पर उंगलियों के हिना ने लिखा
नाम बस आस के एक अनुराग का
रंग उसमें उतरता गया आप ही
गुनगुनाती उमंगों भरे फाग का
कंगनों में जड़े, मोतियों में पिरो
शब्द संबंध के एक अनुबन्ध के
सांस की क्यारियों में लगीं रोपने
धड़कनें, बीज शत-जन्म-सौगन्ध के
वाह!गुरूदेव...सारी रचना बेहद खूबसूरत बन पडी़ है,..आपसे बहुत कुछ सीखना है,..
बहुत-बहुत बधाई!
सुनीता(शानू)
Dr.Bhawna said…
सही और सुन्दर लिखा है आपने राकेश जी, क्योंकि प्यार की गहराई तो उसमें ही है जो बिना कहे मन की बात समझ सके वही प्यार की सच्चाई भी है।

अब समझने लगा, अर्थ सारे छुपे
और अभिप्राय, हर अनकही बात में

और वो तो नसीब वाले होते हैं जिनकी कामना छोटी होती है और पूरा दिल लबालब हो जाता है प्यार से, ऐसे प्यार की चाह सबको होती है। दिल के तारों को छू देने वाली भावों की गंगा के दर्शन हो गये आपकी इस रचना से और क्या कहूँ ऐसा लगता है दिल ही उडेल कर रख दिया।

कामना बून्द की थी, मिली प्रीत से
बादलों के भरे कोष की गागरी

मुबारकबाद
रेखाजी, भावना कुँअर जी, मोहिन्दरजी आभारी हूँ
परमजीतजी और सुनीताजी, अब धन्यवाद स्वीकारें
कागज़ की बगिया पर मैं बस शब्दों के कुछ बीज रोपता
नजर आप सब की है लेकर जो आ जाती मस्त बहारें
Udan Tashtari said…
अरे, इतनी लम्बी टिप्पणी किये थे, कहाँ गुम गई??

खैर, तारीफ बहुत किये थे, यही बताने फिर आये हैं कि रचना का कोई जबाब नहीं,बहुत खूब.
समीर भाई
आप लिखें या नहीं, विदित है मुझे आपके मन का जो रस
आनंदित होकर कर जाता है वह ही टिप्पणियां बरबस
लम्बी लिखें, शब्द या दो की, या कोई भी शब्द न लिखें
मेरा गीत आपको छूत, यही प्रेरणा को काफी बस

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