जिसकी रही प्रतीक्षा, केवल आई नहीं वही

सोम गया, मंगल बुध बीते और रहा गुरु भी एकाकी
शुक्र शनि रवि, एक निमिष भी सुधियों वाली हवा न आई

उड़े कुन्तलों के सायों से नजर बचा कर गईं घटायें
फुलवारी की परछाईं से कन्नी काट, बहारें गुजरीं
सुर की गलियों को सरगम ने गर्दन जरा घुमा न देखा
बिछी रही पतझर के आंगन वाली धूल, धूप में उजरी

झंझाऒं का रोष बिखरता रहा रोज द्वारे चौबारे
जिसकी रही प्रतीक्षा, केवल आई नहीं वही पुरबाई

सावन की शाखों पर बादल आकर नहीं हिंडोले झूले
अमराई, आषाढ़ी स्पर्शों की अभिलाषा लेकर तरसी
कोयलिया के कंठ निबोली, रही घोलती अपने रस को
शहतूती माधुर्यों वाली कोई बदली इधर न बरसी

जाने क्या हो गया, निशा की काली कमली की कजराहट
किरण किरन कर निगल गई है, प्राची की चूनर अरुणाइ

झीलों की लहरों पर आकर तैरे नहीं हंस यादों के
नदिया के तट के पेड़ों पर बातें कोई करे न पाखी
नजरें द्वार खटखटाती हैं देखे और अदेखे सब ही
लेकिन कोई खिड़की तक भी पल्ले खोल नहीं है झांकी

अभिलाषा यों तो उड़ान ले, गई गगन से टकराने को
पंख धूप में झुलस गये तो मुँह की खाये वापस आई

कुछ----- गीतों से परे

अर्थ सावन के उमड़ते बादलों का तो न जाना
न हुआ सन्देश जो था छुप गया, पहचान पाना
किन्तु दीपक प्रीत के विश्वास का तब जल उठा है
जब तुम्हारे होंठ पर गूँजा, लिखा मेरा तराना
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मैं तुम्हारे नयन के हर चित्र को पहचानता हूँ
और अधरों पर टिका स्वीकार है मैं मानता हूँ
आतुरा तुम हो मेरे भुजपाश में आओ, सिमट लो
किन्तु है संकोच थामे पांव को, मैं जानता हूँ

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क्योंकि करने के लिये है अब न कोई प्रश्न बाकी
इसलिये आकांक्षायें उत्तरों की भी नहीं है
एक पत्थर से भला मैं किसलिये वरदान मांगू
ज़िन्दगी में पत्थरों की जब कमी बिल्कुल नहीं है

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पत्थरों को रंग देकर शीश पर हमने सजाया
फूल, अक्षत रोलियों से नित्य पूजा, जल चढ़ाया
सांस के मंत्रों पिरोई धड़कनों की आहुति दी
और ये सोचा नहीं है आज तक, क्या हाथ आया

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नीर की बून्द को तूलिका में पिरो

नीर की बूंद को तूलिका में पिरो
रात में रंग भरती रही चाँदनी

एक इस बून्द को ये विदित कब हुआ
गेह से साथ कितने निमिष का रहे
छोड़ दहलीज को जब चले तो भला
कौन सी धार के साथ मिल कर बहे
जाये मंदिर, रहे आचमन के लिये
एक खारे समन्दर में जा लीन हो
छलछलाये सुलगती हुई पीर में
या कि उमड़े सपन जब भी रंगीन हो

चूड़ियों के सिरे पर टिकी रो पड़े
या कि मुस्काये सिन्दूर संग मानिनी

ओस बन कर गिरे फूल के पात पर
बन के सिहरन कली के बदन में जगे
सीपियों में सजे मोतियों सी संवर
ज्योति बन कर किसी साधना को रँगे
बन हलाहल भरे कंठ में नीलिमा
तॄप्त कर दे कोई प्यास जलती हुई
प्राण संचार दे इक बियावान में
आस बन कर घटा में उमड़ती हुई

वह उमड़ती कभी तोड़ गिरिबन्ध को
तो कभी छेड़ती रागमय रागिनी

चित्रकारी करे, कैनवस कर धरा
रख नियंत्रण चले वक्त की चाल पर
सॄष्टि का पूर्ण आधार बन कर रहे
लिख कहानी अमिट काल के भाल पर
मिल मलय में चढ़े शीश पर ईश के
और प्रक्षाल दे पाहुने पांव को
पनघटॊं की खनकती बने पैंजनी
उग रही भोर में, ढल रही शाम को

सूक्ष्म से एक विस्तार पा कर चले
ज़िन्दगी की बनी ये हुई स्वामिनी

धड़कनें आज विद्रोह करने लगीं

कर रही थी तकाजा निरन्तर कलम
लिख रखूँ मैं नियम चन्द व्यवहार के

धड़कनें आज विद्रोह करने लगीं
तय किया ताल के साथ अब तक सफ़र
सांस की सहचरी बन चली हैं सदा
कोई अपनी नहीं थी बनी रहगुजर
आज नेतॄत्व की कामनायें लिये
पंथ अपना स्वयं ही बनाने लगीं
सांस आवाज़ देती हुई रह गई,
मुड़ के देखा, अंगूठा दिखाने लगीं

और गाता रहा एक भिक्षुक ह्रदय
गीत, कर जोड़ कर उनकी मनुहार के

सांस ने तो किया है समर्पण मगर
अपनी ज़िद पे अड़ी, कुछ भी मानी नहीं
हो विलग कोई अस्तित्व उनका नहीं
सत्य थी बात पर उनने जानी नहीं
कब हुई देह परछाईयों से अलग
कब विलग हो रहा फूल, रसगंध से
सब ही सम्झा थके, मानती ही नहीं
डोर ये है बँधी एक अनुबन्ध से

उँगलियाँ आज अपनी छुड़ा कर चलीं
चेतना के झनकते हुए तार से

आज जन्मांतरों की शपथ भूलकर
चाहती हैं लिखें इक कहानी नई
दूर कितनी चली धार लेकिन, अहो
तोड़ कर बन्धनों को उफ़नती हुई
अग्नि, ईधन बिना शेष कब रह सकी
सीप मोती अकेले कहां बुन सके
चाह है ज़िद को छोड़ें जरा एक पल
और सच्चाई को गौर से सुन सके

एक ज़िद ही निमिष में मिटा डालती
साये फ़ैले घने एक विस्तार के

चान्दनी सरगमों में पिघल कर घुली

एक ॠतुराज के पुष्प शर से झरी, पांखुरी देह धर सामने आ गई
चान्दनी सरगमों में पिघल कर घुली राग में शब्द को ढाल कर गा गई
जो कला मूर्त्तियों में ढली थी खड़ी, आज परदा स्वयं पर गिराने लगी
आपकी एक छवि कल्पना से निकल, दॄष्टि के पाटलों पे जो लहरा गई

चित्र जितने अजन्ता की दीवार पर थे टँगे देखते देखते रह गये
भ्रम जो सौन्दर्य के थे विमोहित किये,एक के बाद इक इक सभी ढह गये
तूलिका लाज के रंग में डूब कर फिर सिमटने लगी आप ही आप में
आप के चित्र को देखने नभ झुका आप सा है न दूजा सभी कह गये

शिल्प में घुल गई आज कोणार्क के, गंध वॄन्दावनों की उमड़ती हुई
प्यास को मिल गई स्वाति की बूँद ज्यों आज बैसाख के नभ से झरती हुई
पारिजाती सुमन से बने हार को, हाथ में ले शची आ खड़ी राह में
मौसमों के लिये रँग सब साथ में, आपके चित्र में रंग भरती हुई

होठों पे उगती रही प्यास भी

खुश्कियाँ मरूथलों की जमीं होंठ पर शुष्क होठों पे उगती रही प्यास भी
आपके होंठ के स्पर्श की बदलियां पर उमड़ के नहीं आ सकीं आज भी

नैन पगडंडियों पर बिछे रह गये मानचित्रों में उल्लेख जिनका न था
इसलियी आने वाला इधर की डगर राह भटका हुआ एक तिनका न था
चूमने पग कहारों के, मखमल बनी धूल, नित धूप में नहा संवरती रही
गंध बन पुष्पकी बाँह थामे हवा कुछ झकोरों में रह रह उमड़ती रही

सरगमें रागिनी की कलाई पकड़ गुनगुनाने को आतुर अटकती रहीं
उंगलियों की प्रतीक्षा मे रोता हुआ मौन होकर गया बैठ अब साज भी

रोलियां, दीप, चन्दन,अगरबत्तियाँ ले सजा थाल आव्हान करते रहे
आपके नाम को मंत्र हम मान कर भोर से सांझ उच्चार करते रहे
दिन उगा एक ही रूप की धूप से कुन्तलों से सरक आई रजनी उतर
केन्द्र मेरी मगर साधना के बने एक पल के लिये भी न आये इधर

घिर रही धुंध में ढूँढ़ती ज्योत्सना एक सिमटे हुए नभ में बीनाईयां
स्वप्न कोटर में दुबके हुए रह गये ले न पाये कहीं एक परवाज़ भी

हाथ में शेष, जल भी न संकल्प का धार नदिया की पीछे कहीं रूक गई
तट पे आकर खड़ी जो प्रतीक्षा हुई जो हुआ, होना था मान कर थक गई,
जो भी है सामने वह प्लावित हुआ बात ये और है धार इक न बही
जानते हैं अधूरी रहेगी सदा साध, जिसको उगाते रहे रोज ही

खो चुका है स्वयं अपने विश्वास को, थाम विश्वास उस को, खड़े हैं हुए
ठोकरें खाके संभले नहीं हैं कभी हम छलावों में उलझे हुए आज भी

होकर मेरा गीत प्रणेता

ढलती हुइ निशा के पल में
और भोर के प्रथम प्रहर में
निंदिया की खिड़की पर कोई
आ मुझको आवाज़ें देता

धुंधली चन्द्र किरण की डोरी को थामे
धीरे धीरे आ जाता है मेरे सपनों में
चित्र उभरता जो नयनों के पाटल पर
वैसा कोई चित्र न परिचित अपनों में
कभी निखरता और कभी ओझल होता
बादल के घूँघट से दिखता हो तारा
बार बार सोचा कुछ नाम उसे दे दूँ
बार बार मैं अपने उपक्रम में हारा

कभी कभी ऐसा लगता है
शायद वह ही है अनजाना
जो कि रहा जाना पहचाना
होकर मेरा गीत प्रणेता

बन्द पड़े मेरे नयनों के दरवाज़े
बिन दस्तक के अनायास खुल जाते हैं
शीशे पर झिलमिल झिलमिल किरणों जैसी
आकॄतियों के मेले आ कर लग जाते हैं
रजत पात्र से कुछ अबीर तब छलक छलक
स्वर्ण किरण की माला में गुंथ जाता है
और अचानक सोये इस निस्तब्ध कक्ष में
दूर कहीं से वंशी सा सुर आ जाता है

खुली पलक में घुले अपरिचय
बन्द पलक के अपने पन में
अन्तर को ढुँढ़ा करता है
मन हो जिज्ञासु नचिकेता

कुछ अजीब सा लगता है अहसास अजाना
अक्षम रहती अभिवयक्ति कुछ उसे कह सके
लगता है कुछ उमड़ा उमड़ा मन के नभ से
किन्तु पिघलता नहीं धार में बँधे बह सके
रह रह कर लगता है मुट्ठी में कुछ बँधता
हाथ खोल देखूँ तो शून्य नजर आता है
पाखी एक बैठता है मन छत मुंड़ेर पर
पाने को सामीप्य बढ़ूँ तो उड़ जाता है

एक पंख चितकबराअ लेकर
अभिलाषित अम्बर को छू ले
इसीलिये सुरहीन कंठ से
शब्दों को रँगता कह देता

ज़िन्दगी बस बिलम्बित बजाती रही

तुम को आवाज़ देता रहा हर निमिष
पर महज गूँज ही लौट आती रही

दर्द सीने में अपने छुपाये रखा
था बताने से कुछ भी नहीं फ़ायदा
प्यार की रीत क्या ? मैने जानी नहीं
न ही समझा यहाँ का है क्या कायदा
भावनाओं में उलझा रहा अब तलक
लोग मुझको खिलौना समझते रहे
चाह कर भी शिकायत नहीं कर सका
शब्द मेरे गले में अटकते रहे

और तन्हाइं दीपक जला कर कइं
दवार दिल के दिवाली मनाती रही

थे उठे ठोकरों से, गुबारों को मैं
सींच कर आँसुओं से दबाता रहा
पथ तुम्हारा सुखद हो सके इसलिये
राह में अपनी पलकें बिछता रहा
पर गये तुम तो फिर लौट आये नहीं
साथ पलकों के नजरें बिछी रह गइं
आँसुओं की उमड़ती हुइं बाढ़ में
मेरे सपनों की परछाइंयाँ बह गइं

और अम्बर से लौटी हुइं प्रतिध्वनि
शंख, ढ़ोलक , मजीरे बजाती रही

पाँव फ़िसले मेरे सर्वदा उस घड़ी
इन्च भर दूर जब था कंगूरा रहा
दूसरा अन्तरा लिख ना पाया कभी
गीत हर एक मेरा अधूरा रहा
एक पल देर से राह निकली सभीं
एक पग दूर हर एक मन्ज़िल रही
एक टुकड़ा मिली चाँदनी कम मुझे
एक जो साध थी, अजनबी हो रही

और सूनी नजर को क्षितिज पर टिका
ज़िन्दगी बस बिलम्बित बजाती रही

बांसुरिया की तान हो गई

मेरे जिन गीतों को तुमने एक बार गुनगुना दिया है
उन गीतों की धुन, कान्हा की बांसुरिया की तान हो गई

शब्द शिल्प में ढल कर प्रतिमा, यों ही नहीं बना करते हैं
रागों के आरोहों पर स्वर यों ही नहीं चढ़ा करते हैं
यों ही नहीं घटा की संगत गगन श्याम रंग में रँग देती
विहग भाव के बिना पंख के यों ही नहीं उड़ा करते हैं

तुमने जिसको अपने कोमल स्वर का मधुमय स्पर्श दिया है
वही भावना, उगी भोर की अँगड़ाई का गान हो गई

बिना परस पाये पारस का लौह स्वर्ण में कब ढलता है
और अग्नि का स्पर्श न पाये, स्वर्ण कहां कुन्दन बनता है
और नहीं उंगलियां कला की दें अपने चुम्बन का जादू
तो फिर कुन्दन कहां किसी आभूषण में ढल कर सजता है

आज तुम्हारे अधरों के गुलाब ने जिसे छू लिया आकर
एक पंक्ति में लिखी बात भी गज़लों का उन्वान हो गई

बिना सुरों के लिखे हुए सब गीत अधूरे रह जाते हैं
नयन-सेज के आमंत्रण बिन, सारे सपने ढह जाते हैं
सुरभि न कर दे यदि हस्ताक्षर, तो पुष्पों का रूप अधूरा
पत्र बिना अवलबन के शाखों से गिर कर बह जाते हैं+

मिला तुम्हारे कंठ सरगमी का जो साथ आज उसको तो
श्वेत शब्द की चूनरिया, इक सतरंगा परिधान हो गई

याद आई तो ऐसा लगा

याद आई तो ऐसा लगा कांच पर इन्द्रधनुषी किरण छटपटाने लगी
जो अबीरों से लबरेज थीं प्यालियां, वे सभी की सभी छलछलाने लगीं
तान आने लगी बाँसुरी की मधुर,दूर से डोरियों में हवा की उलझ
चित्र आँखों में पल पल बदलने लगे, कल्पना और कुछ कसमसाने लगी

ये घटा जो घिरी, आपके कुन्तलों की मुझे याद फिर आज आने लगी
दामिनी खिलखिलाई गगन में कहीं, एक छवि आपकी मुस्कुराने लगी
यूँ तो यादों का मौसम रहा है सदा, आज की बात कुछ और ही है प्रिये
एक बदरी पिरोये हुए बून्द में, आपके गीत को गुनगुनाने लगी

फिर दहकने पलाशों के साये लगे, गुलमोहर याद के लहलहाने लगे
जो अमलतास की छांह से थे बँधे, सारे अनुबन्ध फिर याद आने लगे
वक्त की करवटों में छुपे थे रहे, आज जीवन्त पल वे सभी फिर हुए
इक नये राग में गा उठे प्रीत-घन,साज मन के सभी झनझनाने लगे

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...