पैंतीसवां पड़ाव एक पथ पर

आज उगती हुई भोर ने देखकर
ओस में भीग दर्पण बनी पाँखुरी
मुस्कुराती हुई कल्पनाएं लिए
कामनाये सजा कर भरी आंजुरी 

फिर खुले पृष्ठ पैंतीस इतिहास के
फिर से जीवंत होनेे लगी वह घडो
गुनगुनाते हुए सांझ ने  जब दिशा
अपने सिन्दूर के रंग से थी भरी
देहरी छाँव ओढ़े हुए तरुवरी
आप ही आप रंगोलियों में सजी
और पुरबाइयाँ थी बनी बांसुरी
प्रीत की मदभरी रागिनी में बजी

आज फिर से जगीं वे ही अनुभूतियाँ
राह दो, ज़िन्दगी की परस्पर जुडी

नैन के व्योम में चित्र उभरे पुनः
यज्ञ में आहुति ले जगी थी अगन
मंत्र के साक्ष्य में स्वर संवरते हुए
गुनगुनाते हुए वेदवर्णित वचन
बात करती अबोले हुए मौन से
कंगनों से, रची हाथ की मेंहदियां
आतुरा सा अलक्तक रंगा पाँव में
आगतों की नयन में घिरी बदलियां

दृष्टि नजरें चुरा एक पल को मिली
दुसरे पल घुमा दृष्टियों को मुड़ी

आज अनुभूतियों की घनी झील से
सीपियों से निकल चंद मोती मिले
मुद्रिका में दिवस की जड़े नग बन
जब समन्वय के जुड़ने लगे सिलसिले
सोच की भिन्न पगडंडियां आप ही
जाने कैसे मिली एक ही पंथ में
एक अदृश्य डोर्रे रही बांधती
जन्म शत की डगर नित्य अनुबंध में

खोलने वीथियां अब नई व्योम में
भावना आज परवाज़ लेकर उडी

1 comment:

Udan Tashtari said...

आज अनुभूतियों की घनी झील से
सीपियों से निकल चंद मोती मिले..अद्भुत प्रभु

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...