संभाव्य हो जाने लगा है

अनकहे ही बात जब संप्रेषणा पाने लगे तो
मौन रह कर रागिनी मन की मधुर गाने लगे तो
भावनायें बांसुरी को आप ही जब टेरती हौं
नींद पलकें छोड़ नयनों से परे जाने लगे तो
 
जान लेना जो ह्रदय में कामना अंगड़ाई लेती
पर लगाकर वह अभी गंतव्य को पाने लगी है
 
प्रश्न से पहले खुलें मालायें सारी उत्तरों की
पालकी ऋतुगंध ले दहलीज छूले पतझरों की
शब्द बिन अभिप्राय के मानी सभी पहचान जायें
एक ही पल में समाये आ निधी संवत्सरों की
 
तब समझ लेना खिंची हर एक रेखा हाथ वाली
अर्थ में शामिल हुए मंतव्य को पाने लगी है
 
लग पड़ें जब दर्पणों में बिम्ब सहसा मुस्कुराने
पंखुरी छूकर कपोलों को लगे जब गुनगुनाने
नैन झुकने लग पड़ें उठ उठ अकारण ही निरन्तर
लग पड़ें जब भोर की रंगत स्वत: आनन सजाने
 
जान लेना उम्र की दहलीज पर इक प्रीत गाथा
छोड़ कर इतिहास अब संभाव्य हो जाने लगा है 
 
ओढ़ ले जब सावनी चूनर दिवस बैसाख वाला
 कक्ष में बैठा रहे आ भोर का मधुरिम उजाला 
लहरिया मंथर हवा की गाल छूकर गुनगुनाये 
सप्त्वर्णी   हो लगे जब यामिनी का रंग काला 
 
तब समझ लेना कमल के पत्र पर की ओस बूँदें 
छू तुम्हारे होंठ नव वक्तव्य इक पाने लगी हैं 

2 comments:

तुषार राज रस्तोगी said...

बहुत खूब | उम्दा अभिव्यक्ति लाजवाब |

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर..

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...