संप्रेषणों में शब्द की सीमा

कभी अनुभूति के संप्रेषणों में शब्द की सीमा
अजाने ही अचाहा भाव का कुछ अर्थ कर देती
बदलती सोच की परछाईं में उलझी हुई सुधियां
अपेक्षित जो नहीं होता वही ला गंध भर देती


हुये जब दायरे सीमित हमारी चेतनाओं के
न कहना जान पाते हम न सुनना जान पाते है


उमड़ते अश्रुओं के भाव जब जब शब्द में ढलते
तो शब्दों को भी निश्चित ही हुई अनुभूत पीड़ायें
मगर हर शब्द का धीरज, सहन की शक्तिइ अद्भुत है
किया बिलकुन न उन सब ने व्यथा अपनी जता जायें


दिये भाषाओं ने जो ज्ञान के मुट्ठी भरे मोती
वे बिंधते तो हैं, माला में नहीं सम्मान पाते हैं


निरन्तर जो बहे झरने द्रवित हो शैल से मन के
उन्हीं में खो गये हैं धार के खनके हुये नूपुर
तटी की दूब ने सारंगियाँ बन तान जो छेड़ीं
रहा अवरोह में उनके भटकता कंठ का हर सुर


गयी सौंपी करों में ला हमारे एक जो वीणा
नहीं संगीत रचते ,तार केवल झनझनाते हैं

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द नहीं दे पाते साथ,
मन रह जाता, रहती बात।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...