मैं नया इक गीत लिख दूँ आज मुझ से कह रहा है

जाये रच परछाईयों के पांव में भी जब महावर

धूप की अंगनाई में पायल हवा की झनझनाये
दोपहर की थाम उंगली सांझ करती नॄत्य हो जब

वीथिका में गंध की सारंगियों पर फूल गाये
उस घड़ी लगता तुम्हारा चित्र मेरे सामने आ
मैं नया इक गीत लिख दूँ आज मुझ से कह रहा है

कह रहा परवाज़ दूँ मैं कल्पनाओं के विहग को
सुघर मोती से रखे हैं ओसकण पर जो पगों को
शब्द नूतन कुछ रचूँ मैं बाँध जो विस्तार पाये
जो विमोहित कर रहा है एक छवि से सकल जग को
और मेरी   लेखनी के कोष में संचित अभी तक
मैं उजागर आज कर दूँ फिर मुझे यह कह रहा है

आज लिख दूँ फिर तुम्हारे अरुण अधरों की कहानी
गाऊँ जो में गात में महकी हुई है रात रानी
कुन्तलों में ले रहीं आकर शरण अनगिन अमायें
इन्द्र की अलकापुरी की भेंट जो प्रतिमा सुहानी
शब्द पुलकित हो रहा है भाव की भीनी सुरा से
और अपने आप ही फिर गीत बन कर बह रहा है

कह रहा है गीत में रच दूँ तुम्ही को मैं सजाऊँ
छंद में बुनकर तुम्हारा नाम ही बस गुनगुनाऊँ
जो कुमुदिनी ने बतायें हैं मधुप को भेद निशि में
कह रहा है बस उन्हीं को मैं सुनूँ, तुमको सुनाऊँ
दॄष्टि लेकिन नैन से जाकर तुम्हारे जब मिली है
तब मेरी क्षमताओं का पाला हुआ भ्रम ढह रहा है

शब्द से बंधने लगी है एक सावन की बदरिया
राग देकर तान में जाती मुझे गाती कजरिया
कह रही है पैंजनी यमुना किनारे की कथा को
बाँसुरी से कर रहा लगता इशारे कुछ संवरिया
अक्षरों में ढल गये हैं पुष्पपत्रों के तुहिन कण
और लगता काव्य, बन कर एक सरिता बह रहा है

8 comments:

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Udan Tashtari said...

कह रहा है गीत में रच दूँ तुम्ही को मैं सजाऊँ
छंद में बुनकर तुम्हारा नाम ही बस गुनगुनाऊँ
जो कुमुदिनी ने बतायें हैं मधुप को भेद निशि में
कह रहा है बस उन्हीं को मैं सुनूँ, तुमको सुनाऊँ
दॄष्टि लेकिन नैन से जाकर तुम्हारे जब मिली है
तब मेरी क्षमताओं का पाला हुआ भ्रम ढह रहा है


-लाजबाब!! वाह...आनन्द आ गया!

विनोद कुमार पांडेय said...

कह रहा है गीत में रच दूँ तुम्ही को मैं सजाऊँ
छंद में बुनकर तुम्हारा नाम ही बस गुनगुनाऊँ
जो कुमुदिनी ने बतायें हैं मधुप को भेद निशि में
कह रहा है बस उन्हीं को मैं सुनूँ, तुमको सुनाऊँ
दॄष्टि लेकिन नैन से जाकर तुम्हारे जब मिली है
तब मेरी क्षमताओं का पाला हुआ भ्रम ढह रहा है

राकेश जी कितनी खूबसूरती से आपने भाव प्रस्तुत कर जाते है..एक एक लाइन बेहतरीन लगती है...बहुत बढ़िया रचना...

Shardula said...
This comment has been removed by the author.
M VERMA said...

अक्षरों में ढल गये हैं पुष्पपत्रों के तुहिन कण
और लगता काव्य, बन कर एक सरिता बह रहा है
शब्दों की सरिता ही तो है जो बह रही है.
बेहतरीन

रंजना said...

आह...श्रृंगार की परम पावन,सरस , कोमल अद्वितीय अप्रतिम मुग्धकारी अभिव्यक्ति...
मन परमनान्दित हो गया पढ़कर...
बहुत बहुत आभार...

Shardula said...

हे भगवान! ज़रा कलम की नज़र उतारिये गुरुदेव! कोई बार बार इतना सुन्दर थोड़े ही लिखता है ... उफ्फ गा के तो ये गीत क्या लगता है क्या बताऊँ... बस बार बार एक ही बात... काव्य बन कर एक सरिता बह रहा है , बह रहा है, बह रहा है.....
अति अति सुन्दर... मधुरतम!

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