काव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं
छंद आकर स्वयं ही संवरते गये
आप
आपकी प्रीत में डूब कर मीत हम, भोर से सांझ तक गुनगुनाते रहे नैन के पाटलों पर लगे चित्र हम रश्मि की तूलिका से सजाते रहे आपके होंठ बन कर कलम जड़ गये, नाम जिस पल अधर पर कलासाधिके वे निमिष स्वर्णमय हो गये दीप से, बन के दीपावली जगमगाते रहे
2 comments:
बेहतरीन!!
जाने कैसे सुन्हरे ये शब्दार्थ है
कान में गूँज बनकर बुलाते रहे.
दाद के साथ
देवी
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