आपकी प्रीत में डूब कर मीत हम, भोर से सांझ तक गुनगुनाते रहे
नैन के पाटलों पर लगे चित्र हम रश्मि की तूलिका से सजाते रहे
आपके होंठ बन कर कलम जड़ गये, नाम जिस पल अधर पर कलासाधिके
वे निमिष स्वर्णमय हो गये दीप से, बन के दीपावली जगमगाते रहे
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नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
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प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
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मूर्च्छित है भावना, बिंध वक्त के पैने शरों से लेखनी हतप्रभ शिथिल है, मौन लेखन ओढ़ता है काल के तो चक्र चलते हैं सदा होकर दुधारे युद्ध तो थमता ...
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इस पनघट पर तो छलकी हैं सुबह शाम रस भरी गगरैया लेकिन प्राणों के आँगन में तृषा रही बाकी की बाकी अधरों पर उग रही प्यास ने कितने ही झरने प...
2 comments:
बेहतरीन!!
जाने कैसे सुन्हरे ये शब्दार्थ है
कान में गूँज बनकर बुलाते रहे.
दाद के साथ
देवी
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