आप - एक अंतराल के पश्चात पुन:

आपकी देख परछाईयाँ झील में, चाँदनी रह गयी है ठगी की ठगी
आप बोले तो मिश्री की कोई डली, फ़िसली होठों से ज्यों चाशनी में पगी
मुस्कुराये तो ऐसा लगा है गगन आज बौछार तारों की करने लगा
नैन जैसे खुले, आस के रंग में डूब कर कल्पनायें उमगने लगीं

-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-

आपकी दॄष्टि की रश्मियों से जगे, बाग में फूल अँगड़ाई लेते हुए
सावनी मेघ घिरने लगे व्योम में, आपके कुन्तलों से फ़िसलते हुए
साँस की टहनियाँ थाम कर झूलतीं, गुनगुना मलयजी होती पुरबाइयाँ
नैन की काजरी रेख से बँध गये, सुरमई सांझ के बिम्ब ढलते हुए

-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-

4 comments:

Mired Mirage said...

सुन्दर कविता है ।
घुघूती बासूती

Divine India said...

नई सोंच और हर अंतराल के बाद नये आयाम है आपके मुख पर…।
बहुत अच्छा लगा…।

Udan Tashtari said...

बढ़िया मुक्तक. आनन्द आया पढ़कर.

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया मुक्तक हैं।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...