मीत ! ह्रदय की अँगनाई में मैने जो निर्माण किया है
उसका उद्घाटन करने को आज तुम्हें आमंत्रण भेजा
पत्थर लिये भावनाओं के, मन मकराना की खानों से
पच्चीकारी की है उन पर कोयल की मधुरिम तानों से
एक अनूठी लगन रोप कर रखी हुई आधार शिलायें
जिन्हें मांग कर लाया हूँ मैं, इतिहासों के दीवानों से
एक तपस्वी के दॄढ़ निश्चय सी दीवारों से आरक्षित
मंदिर में बस एक तुम्हारी ही प्रतिमा को रखा सहेजा
प्राची की अँगड़ाई लेकर भित्तिचित्र हर ओर बनाये
अनुभूति के फूल द्वार पर वंदनवार बना लटकाये
भावुकता के निमिष पिरोकर रँगी अल्पनाऒं से देहरी
नयनों के सतरंगी सपने कालीनों की तरह बिछाये
और तुम्हारी छवियों वाले रंग लिये फूलों को रंगता
फुलवाड़ी की हर क्यारी में मन का ये पागल रँगरेजा
सौगंधों की कड़ियां जोड़ीं विश्वासों के शहतीरों से
रखी आस्थाओं की छत पर निष्ठाओं की ज़ंज़ीरों से
साधी कंदीलों में ज्योतित मैने किया साधनाओं को
राहें दीप्तिमान कीं सारी , सम्बन्धों की प्राचीरों से
अगवानी की थाली में रख कर सर्वस्व हुआ संकल्पित
मीत मेरे यह सब कुछ तेरा, जो चाहे वह आकर लेजा
चन्दन की गंधें टाँगी है लाकर मैने वातायन पर
पुरबाई के नूपुर मेंने जड़े हुए खिड़की की सिल पर
जूही की कलियों के परदों में गुलाब की पंखुरियों को
एक तुम्हारा स्वागत करने को लटकाया हर चौखट पर
और तुम्हारी गलियों से जो चला, हवा के हर झोंके से
कहा, तुम्हारे पग उठते ही आकर के संदेसा दे जा
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4 comments:
वाह, क्या बिम्ब हैं!! बहुत खूब. आनन्द आया गीत पढ़कर.
सौगंधों की कड़ियां जोड़ीं विश्वासों के शहतीरों से
सुन्दर कविता, धन्यवाद ।
“आरंभ” संजीव का हिन्दी चिट्ठा
धन्यवाद गुरूदेव क्या सुन्दर गीत है, बहुत दिन से आपकी रचना पढ़ नही पाई थी...
सुनीता(शानू)
राकेश जी गीत के बोल बहुत अच्छे हैं बहुत-बहुत बधाई कुछ पंक्तियां बहुत पंसद आईं...
प्राची की अँगड़ाई लेकर भित्तिचित्र हर ओर बनाये
अनुभूति के फूल द्वार पर वंदनवार बना लटकाये
भावुकता के निमिष पिरोकर रँगी अल्पनाऒं से देहरी
नयनों के सतरंगी सपने कालीनों की तरह बिछाये
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