बस कुहासे मिले

अतिक्रमण बादलों का हुआ इस तरह
चाँदनी की डगर पर कुहासे मिले
रंग ऊषा ने आ जो गगन में भरे
वे धुंआसे, धुंआसे धुंआसे मिले

बन मदारी बजाते हुए डुगडुगी
र्क कोने में पहले हुए आ खड़े
उंगलियों का सहारा तनिक जो मिला
सीधे कांधों पे आकर के बौठे चढ़े
नाम अपना बताते रहे सावनी
किन्तु भटके पथिक थे ये बैसाख के
बस मुखौटा चढ़ाये शैं मुस्कान का
ये लुटेरे सहज भोले विश्वास के

साथ इनके चले पग जो दो राह में
वे सभी आज हो बदहवासे मिले

मन रिझाने को आये ले नॄत्यांगना
साथ अपने चपल सिरचढ़ी दामिनी
मंत्र सम्मोहनों के हजारों लिये
उर्वशी मेनका की ये अनुगामिनी
कर वशीभूत सबको छले जा रही
नीलकंठी बना हमको विष दे रही
मोहनी बन भरे सोमरस के चषक
अपने अनुरागियों को दिये जा रही

और आश्वासनों के भंवर में उलझ
जो कि लहरों के नाविक थे, प्यासे मिले

पोखरों के ये दादुर थे कल सांझ तक
आज नभ चढ़ गये, चलते फ़रजी बने
अपने कद से भी ऊँचे बहुत हो गये
अपना आधार पाते नहीं देखने
हैं ये पुच्छल सितारों से यायावरी
पंथ का भान होते बरस बीतते
और हर बार गमलों में रोपी हुइ
स्वप्न की क्यारियाँ सैंकड़ों सींचते

इनके पनघट पे कांवर लिये जो गया
उसको भर भर कलश सिर्फ़ झांसे मिले

1 comment:

Udan Tashtari said...

पोखरों के ये दादुर थे कल सांझ तक
आज नभ चढ़ गये, चलते फ़रजी बने
अपने कद से भी ऊँचे बहुत हो गये
अपना आधार पाते नहीं देखने


---वाह, वाह, और इक धुँआ से ---धुँआ से. बहुत बढ़िया.

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