अंधेरे की तराई में चमकते चांद की किरणें
तुम्हारे नाम का दीपक जला कर साथ लाई हैं
बहारों की गली में चल रही अल्हड़ हवाओं ने
तुम्हारे नाम वाली इक गज़ल फिर गुनगुनाई है
चमेली की पंखुरियों पर फिसलते ओस के कतरे
चढ़े कचनार के मुख पर उषा के रंग कुछ गहरे
उमंगो के पिये प्याले है जूही मुस्कुराती सी
नदी की धार गाथायें प्रणय की कुछ सुनाती सी
किनारों पर बिछी सिकता तुम्हारे पांव का कोमल
परस पाकर खुशी में डूब कर फिर थरथराई है
दिवस की मौन पगध्वनियाँ निशा का आगमन हौले
सितारों की गली में स्वप्न अपनी टोकरी खोले
तुम्हारी एक अँगड़ाई घुली है इस तरह जग में
समय भी रुक गया, जंजीर जैसे हो बंधी पग में
प्रकॄति के दर्पणों में आज कोई खिलखिलाती सी
तुम्हारी एक मोहक छवि लगा आकर समाई है
धरा के पॄष्ठ हरितों पर सुखद नीलाभ आमंत्रण
उमड़ते फेन में घिर कर क्षितिज का मूक परिवर्तन
सिहरता वादियों में एक नटखट सा कोई झोंका
शिला के श्रंग पर होता सहज अभिषेक चाहों का
तुम्हारी रूप का श्रंगार लेकर आज जगती ने
लगा है सातरंगी चूनरी फिर से सजाई है
संवरते पेड़ की शाखों पे रंगीं धूप के साये
थिरकते एक सुबह में निमिष यादों के अलसाये
किरण की पालकी के साथ भोपा गायकी के सुर
बजे हों बाऊलों के गीत में ज्यों पांव के नूपुर
घुले सारंगियों में आज अलगोजे लिये सरगम
तुम्हारे ही स्वरों की आज इनको याद आई है
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1 comment:
गीत मेरे ही बजे हैं आज तेरे भी स्वरों में
ज्यों खुनक सी फैलती रौशन हवाओं में
पंछियों की चहचहाट पेड की शाखों सजी है
कई सुनहरे ख्वाब से पलके भरी हैं
आओ बैठे साथ कुछ बोले न बोलें
पींग भरती याद ज्यों झूले में डोले
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